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Quartered into snow; silent to remain,
When the bugle calls; They shall rise and march again.

Monday, 20 February 2017

आक्रमण के हथियार बदल गये हैं- भाग 1

आपने एमआईबी (मेन इन ब्लेक) देखी थी??
यह उन फिल्मो में से है जिसे मैं ने सिनेमा हाल जाकर देखी थी।फिर सीडी,डीवीडी,पेन ड्राइव का जमाना बदलता गया।अपने में बहुत नये कलेवर में आया था।

...2 जुलाई 1997 को Barry Sonnenfeld द्वारा निर्देशित इस सीरीज की पहली फिल्म आई थी।एलियंस के हमलो और साजिशों पर बनी इस फिल्म ने दुनिया भर मे तहलका मचा दिया था।विल स्मिथ और टामी ली जोन्स दुनिया भर के दर्शको के चहेते सुपर स्टार हैं।लावेल कनिंघम के उपन्यास पर बेस्ड इस फिल्म ने उस समय के हिट टाइटेनिक की बराबरी की थी।फिल्म इतना चली की 2002 मे सेकंड पार्ट,2012 मे तीसरा पार्ट बनाना पड़ा था।
कहानी कोई खास नही है।विल स्मिथ और टामी ली जोन्स एक सीक्रेट एजेंसी मे है जो एलियन्स के ऊपर नजर रखते हैं।एलियन्स कभी आदमी का,कभी कीड़े या जानवर का रूप ले-ले,वेश बदल-बदल कर हमारी दुनिया के खिलाफ साजिश कर रहे...हीरो-हीरोइन उनके खिलाफ लड़ कर उन योजनाए विफल कर देते हैं। इस फिल्म मे गज़ब बात यह दर्शाया गया है की दुनिया मे रह रहे या जन-साधारणों को इन सब घटनाओ की जानकारी मे नही हैं।यही इस फिल्म की खासियत भी है।उसे मेकप,निर्देशन और स्कोरर पर तीन एकेडमी अवार्ड मिले थे।जब कभी किसी साधारण व्यक्ति ने वह घटनाए या संघर्ष देख ली दुनिया भर मे अफवाह और डर फैल जाने का खतरा होता है।'एजेंसी, यानी हीरो-लोग इस पर हर-पल सजग रहते हैं।उनके पास एक से एक गज़ट होते हैं उन्ही मे से एक गज़ट है ''मेमोरी डिलीटर।जो कोई भी उनके बारे मे जान जाता है वे उसकी वह स्पेशल याद डिलीट कर देते हैं।....अंत मे हीरो मुख्य नायक की मेमोरी डिलीट कर देता है क्योंकि वह रिटायर होना चाहता है।


'स्पाटलेस, माइंड आधारित कई फिल्मे हालीवुड मे बनकर आई है।बहुत ही सफल रही है।मेमोरी डिलीट कर दी जाती हैं उसके बाद की जिज्ञासा और ऐक्शन देखते ही बनता है।कुछ फिल्मों मे वे माइंड मे कई और स्पेशल यादे भी जोड़ देते हैं।उनकी बेजोड़ डाइरेकशन,प्रेजेंटेशन,साउंड इफेक्ट असली दुनिया बना डालती है।...डार्क सिटी,.....द ट्रान्स,.....इनसेपशन,.....टोटल रिकाल,.....Eternal Sunshine of the Spotless Mind,......50 फ़र्स्ट डेट,.....म्ंचूरियन कंडीडेट,..... जैसी फिल्मे आपको विज्ञान-गल्प समझने की क्षमता बढ़ा देती हैं कि मानव-कल्पनाओ-रचनाओ के विस्तार का अंत नही।
मुझे 'पे-चेक,और मोमेंटों सबसे ज्यादा पसन्द आई थी।वही मोमेंटों जिसे एक 'चोर,ने हमारे यहाँ 'गजनी, नाम से बना लिया था।मेरे पापा को भी पसंद थी।
''जेसन बोर्न,,सीरीज़ भी मेरी मनपसंद फिल्मे है वह केवल मात्र इसी विषय पर बनी फिल्म है....पांच फिल्मे लुडलूम के इस कथानक पर लगातार बनी और जबर्दस्त हिट रहीं...अगर एक भी देख लिया तो हर फिल्म खींच ही लेगी....गजब ऐक्शन-सस्पेंस-थ्रिल और रोमाँच।एजेंसी के अधिकारी उसकी याददाश्त नष्ट कर चुके है...अपने अतीत को तलाशता हुआ वह हर फिल्म के अंत मे प्रोग्रामर को मार देता है।पाँच सुपर-डुपर हिट मूवी लगातार बनती गई और दर्शको की संख्या मे इजाफा होता गया।साइंस-फिक्सन से अलग इन फिल्मों मे डिफरेंट तरह का कसावट होता है।रहस्य की परते-दर-परते खुलती हैं और रोमांच के चरम पर ले जाती है।
उनकी फिल्मों का सबसे बड़ा पहलू होता है वे अमूमन सुपर-डुपर हिट नावेल्स पर बनती है।यानी स्क्रिप्टिंग बाद मे होती है।
इन फिल्मों को बनाने के पीछे उनका कोई छिपा उद्देश्य अथवा कमीनापन नही होता।.... उनका उद्देश्य केवल मनोरन्जन,जाब सेटिसफैक्सन और पैसा कमाना होता है।विशुद्ध व्यवसाय...कोई हरामी-पंथी नही।इतनी मोटी कमाई है कि आपका दिमाग उड़ जाएगा।
मात्र इस एक विषय 'स्मृति-विलोपन, पर हालीवुड में बनी मात्र 15 फिल्मों ने इतना कमाया है जितना मुंबइया फिल्मों ने अपने ''पचासी-साल मे कुल-मिला-जोड़ कर भी नही कमाया है।जबकि यहां बनी फिल्मो मे भी अधिकाँशतर उनकी नकल, चोरी और कॉपी भी शामिल है..वह कमाई शामिल कर ले तो भी डिलिटर विषय पर बनी कमाई कई गुना हो जाती हैं।
नेट पर सारा डाटा अवलेबल है आप खुद जोड़-घटा ले।जिनको क्न्फ़्युज्न हो मुझसे संपर्क करे।बेसिकल हमारे फिल्म-बाजो का कमाई के अलावा भी कुछ और निशाने पर है।

पिछले कुछ माह पहले मैं ट्रेन से यात्रा कर रहा था।जिस कूपे मे मैं था उसी मे दो-छात्र और एक छात्रा भी सफर कर रहे थे।खाली समय था सो उनसे बाते होने लगी।वे किसी प्राइवेट कालेज से इंजीनियरीग कर रहे थे।पढने-लिखने वाले होन-हार युवा थे।विभिन्न विषयो से गुजरते हुये इतिहास और फिर बाजीराव प्रथम पर बात आ गई।उनही दिनो फिल्म बाजीराव-मस्तानी फिल्म रिलीज हुई थी।
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि 'वे बच्चे बाजीराव को ऐयाश समझते थे।,उन्होने कई कहानिया और भी गढ़ डाली थी।जो निहायत ही घटिया थी।
चुकी बाजीराव के बारे मैं पूरा जानता था इसलिये तुरंत उन्हे करेक्ट किया।उन छात्रो ने यह भी बताया कि वे कल्पनाए किसने सुनाई...वह एक अध्यापक था।मैं ने नाम सुना तो कोई आश्चर्य नही।खुद समझिए!
मेरे समय तक तो कोई अखाड़ा नही बचा था किंतु बाबा,पापा और बुजुर्ग बताते थे कि गाँव के अखाड़े मे वीर शिवाजी,व् बाजीराव की वीरता के नारे लगते थे॥उसकी कहानिया बाबा,पापा और बुजुर्ग सुनाते थे।
जो बाजीराव पेशवा (१७२०-१७४०) पिछले ढाई सौ साल से राष्ट्र की सारी युवा पीढ़ीयों का 'हीरो था,,..आदर्श था।जिसने अपने 19 साल की उम्र मे मुस्लिमो के साम्राज्य की जड़े हिला दी थी। सिकंदर के बाद दुनिया के इतिहास मे ऐसा अजेय योद्धा नही मिलेगा जिसकी मौत 40 साल की उम्र मे हुई हो और उस बीच उसने 50 बड़े युद्ध जीते हो..और एक भी युद्द न हारा हो।उसकी इमेज क्यों खराब की गई आप खुद समझ लीजिए।
सभी सुल्तान,नबाब,सूबेदार 500-500 तक औरते रखते थे, दो हजार हरम रखने वाले अकबर के बजाय "युवाओ के आदर्श-नायक 'पेशवा,के किसी गैर-प्रमाणित प्रेम-संबंध को लेकर ..एक फिल्म बनाया जाता है, उसे "ऐयाश, इंपोज किया जाता है....।आज का युवक उसे प्यार-मुहब्बत टाइप की फिल्मी रंगरेलिया मनाने वाला उजड्ड मराठा समझने लगी।समझने की कोशिश करिए यह क्या है।1932 से देखिये करीब 500 से अधिक मिलेंगी...ज्न्हे एक टारगेट के लिए बनाया गया है।
आप ही सूची तैयार करिए।खुद समझ मे आ जाएगा।
किसने बनाई,और क्यो बनाई!

हालीवुड फिल्मों की 'स्टोरीज़ मे याददाश्त नष्ट करने के लिए कुछ फिल्मों मे 'गज़ट, क्ंप्यूटराइज्ड साफ्टवेयर तो कुछ मे इंजेक्शन,और कुछ मे सम्मोहन या अवचेतन प्रणाली का उपयोग दिखाया जाता है।हमारे फिल्मकार,साहित्यकार,मीडियाकार,कलाकार हालीवुड से बहुत आगे हैं।'वे,प्रोफेशनल नही शोशेषनल हैं... समाज मे ''स्मृति तंत्र विज्ञान, का उपयोग कर लक्ष्य साधते है।वे अपने रिमूवर,इम्पोजीटर, का उपयोग वामी-सामी-कामी दुश्मनों का हित साधने के लिए करते है,उनके पास ''मेमोरी रिमूवर,है उनका शासन पर कब्जा होना,कार्पोरल जगत मे पैठ,कोर्ष,साहित्य,कला,मीडिया,फिल्म,और नौकरशाही।
पिछले सौ साल से वह इसका खुलकर इस्तेमाल कर रहे है।
वे इतिहास की किताब मे घुसकर बता रहे,आर्य बाहर से आए।
अंग्रेज़ो के जमाने से ही वे सनातन समाज की मेमोरी मिटाने का प्रयास करते हैं।
केवल मिटाने ही नही।अपनी बातें,अपनी थ्योरी,शैली,जीवन-चर्या,कल्पनाए,इच्छाए तक थोप देते हैं।आपको पता भी् नही चलता।वे कोर्ष की किताबों,भाषा और इतिहास की किताब मे घुसकर इम्पोज कर देते हैं लुटेरे नही आप बाहर से आए,हारो का इतिहास,..आप का कोई इतिहास नही,अपने ही पूर्वजो के प्रति अनास्था और संशय,आपका बंटा समाज,मुस्लिमो को बुद्धिष्टों ने बुलाया था आदि हजारो-हजार बाते।.....और कोई देखने सुनने-टोकने वाला नही।
.....'लिस्टिंग खुद करे साफ-साफ देख-पहचान लेंगे।

वह केवल विज्ञापन,या कापी-राइटिंग नही है,वह केवल जिंगल नही है,न ही वह
नेट,मैगजीन या 30 मिनट का बुलेटिन है,वह केवल एलईडी टीवी भी नही है, न वह केवल रेडियो मिर्ची या एफ-एम चैनल है,न ही एक हजार से अधिक आ रहे मनोरंजक टीवी चैनल है,...अगर आप उसे केवल गीत-संगीत मान रहे है तो भी धोखे मे है।
वह आपके अवचेतन-मस्तिष्क का ""इम्पोजीटर मशीन, है।जो आपकी यादें छीन रहा है।

वे कोर्ष की किताबों,साहित्य,कलाए,मीडिया,फिल्मों के माध्यम से घुसकर आपके दिमाग से खेलते है।खास हिस्से को "डिलीट, कर रहे होते हैं और अपने कमीने-पन भरी तार्किकता डाल रहे होते हैं।धीरे-धीरे वह लॉजिकल लगने लगता है,और आप उनके पक्ष में बहस करने लगते हैं।आप कुछ जान ही नही पाते क्या हुआ।
जेहन के खास हिस्से से पुरखों की शौर्यगाथाए,गर्व,परिश्रम और संस्कार मिटाते है।अपनी मेमोरी पर "ज़ोर मारिए,वे आपके बाप-दादो की विरासत मिटा रहे हैं।राष्ट्र,समाज,अपने लोगो के प्रति हीनता का अहसास आपको घेर लेता है।

जल्द ही आप वामी-सामी''हजारो पदमिनियों,के जौहर को लव-जेहाद की भेट चढ़ते देखिये।यह एक "वामी लीला भंसाली, है।

पहचान लीजिये यही वह "रिमूवर गजट, है जो ;'मेन-इन-ब्लेक,मे उपयोग होता था,बड़े सलीके से आपके दिमाग में युग अंकित आपके पुरुखो की शौर्य-गाथाए मिटा रहा है।स्वाभिमान के मिटते ही बहन-बेटियां भोग्या में बदल ही जाती हैं।फिर कोई फरक नही पड़ता उन्हें कौन लूट ले जा रहा।

(आगे पढ़िये।हथियार बदल गये हैं--2,,)

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Saturday, 18 February 2017

कश्मीरी जिहादियों की बर्बरता और देशद्रोही पत्रकारों का भारत विरोधी रवैया

 सबसे पहले आप ये वीडियो देखिये.. इस वीडियो में सबसे आगे सेना की एम्बुलेंस जा रही है जिसमे हंदवारा में हुई मुठभेड़ में गम्भीर रूप से घायल मेजर सतीश सतीश दाहिया को अस्पताल ले जाया जा रहा है। एम्बुलेंस की सुरक्षा के लिए पीछे सेना की दो गाड़ियांं और चल रही हैं.. जैसे ही ये  किसी बस्ती से गुजरती हैं, स्थानीय कश्मीरियों द्वारा इसका रास्ता रोकने की पूरी कोशिश की जाती है..  हर जगह इन पर पथराव किया जाता है.. ताकि समय पर घायलों को अस्पताल पहुंचने से रोका जा सके। सेना को स्थानीय लोगों पर गोली चलाने या कोई भी कारवाई करने का आदेश नहीं है। 

अन्त में इसका परिणाम यह होता है कि मेजर दाहिया समय पर इलाज न मिलने के कारण वो इस दुनिया से चले जाते हैं। उनकी पत्नी शादी के तीन साल बाद ही विधवा हो जाती है। उनकी छोटी सी बेटी के सिर से पिता का साया हट जाता है।




 क्या मानवाधिकार का सारा ठीकरा सेना ने ले रखा है? इन क्रूर कश्मीरी जिहादियों का एक एम्बुलेंस पर पथराव  करने में तनिक भी मन नहीं डोला। क्या ये क्रूरता की पराकाष्ठा नहीं है? एक तरफ सेना पर पथराव करते हैं, दूसरी ओर मानवाधिकार का रोना रोते हैं और तो और कुछ देशद्रोही पत्रकार इनकी इस नापाक पत्थरबाजी को सही ठहराते हैं।

पिछले एक या दो दिनों से मीडिया सेना प्रमुख के एक बयान पर कोहराम मचाये हुए है। संक्षेप में बयान यह था कि जो भी सेना की कारवाई में व्यवधान उत्पन्न करने की कोशिश करेगा या सेना पर पथराव करेगा अथवा राष्ट्रद्रोही किसी भी गतिविधि में भाग लेगा जैसे पाकिस्तान या आईएसआई का झण्डा लहरायेगा,  सेना उस पर कड़ी कारवाई करेगी।

अब इस बयान में सेना प्रमुख ने न तो कश्मीरियों के बारे में कुछ कहा न ही कश्मीरी युवाओं के बारे में एक शब्द बोला फिर भी एक तथाकथित पत्रकार हरिन्दर बाजवा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा  “General Rawat, hold your fire. All Kashmiri youth are not aides of Jihadis” अब इसका मतलब तो साफ है कि वो कश्मीरियों को और अस्थिर करना चाहती है.. अपने ही देश, अपनी ही सेना के खिलाफ जहर भर रही हैं। कैसी पत्रकारिता है यह?
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Friday, 23 December 2016

"Taimur Ali Khan" नाम केवल नाम नहीं होते, नामों में बहुत कुछ रखा होता है

कुछ लोग करीना कपूर और सैफ अली खान के नवजात बेटे का नाम तैमूर अली खान रखने पर उनका बचाव करते नजर आते हैं कि नाम में क्या रखा है? ये उनका निजी मामला है?

आपको याद दिला दें कि साल 2008-09 में "गजिनी" और "थ्री इडियट्स" जैसी फ़िल्मों से अधिकृत रूप से शाहरुख़ ख़ान के सुपरस्टारडम को ओवरटेक करने के दौरान जब आमिर ख़ान को वास्तविक "किंग ख़ान" कहा जाने लगा था, तब आमिर ने एक चर्चित ब्लॉग लिखा था, जिसमें सभी को चौंकाते हुए उन्होंने कहा था कि उनके पालतू कुत्ते का नाम "शाहरुख़" है!
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किसको क्रेडिट दें ब्रेग्जिट को या भारत की आर्थिक नीति को जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को ब्रिटेन से आगे कर दिया ।


150 साल बाद ऐसा हुआ है कि भारत की अर्थव्यवस्था ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ा है ।
भारत विश्व का दूसरी सबसे बड़ी जनसँख्या वाला देश है परन्तु टैक्स सिर्फ तीन प्रतिशत लोग ही देते हैं
उसके बाद भी जिस तेजी से भारत की जी डी पी बढ़ रही है वो अपने आप में एक मिसाल है
फरवरी 2016 में ही भारत ने चीन को पीछे छोड़ा था.......अब ब्रिटेन को
जीडीपी के आधार पर विश्व का छठा सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया है
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान भी है कि 2017 में भारत की जीडीपी 7.6 प्रतिशत तक हो जाएगी
पर सरकार का निश्चय इसे डबल डिजिट में पहुँचाने का है ।
मनमोहन सिंह तो बोल गए कि जीडीपी दो प्रतिशत कम हो जाएगी पर उनकी सुनता कौन है इसलिए जीडीपी कुछ समय के लिए आधा से पौन प्रतिशत तक डाउन होगा
फिर भी मुद्रास्फीति को कम रखने और ग्लोबल कमोडिटीज की कीमत में मंदी ने भारत की राह आसान कर दी है
मोदी सरकार ने आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए व्यापक बाजार सुधारों को प्रेरित किया
उधर ब्रिटेन ब्रेग्जिट से निकल गया और उसकी इकॉनोमी एवं करेंसी दोनों संकट से जूझने लगे
आने वाले सालों में फ्राँस और जर्मनी को भी भारत पीछे छोड़ ही देगा बस एक बार और मोदी जी की सरकार बन जाए
काँग्रेस तो चाय भी उधार का पीती है......उससे क्या उम्मीद करना .........मुम्बई में काँग्रेस मुख्यालय के पीछे एक चायवाला है बेचारे को मोदी की बिरादरी का समझ कर दो लाख की चाय पी गए पर पैसे नहीं दिए ।
ऐसे लोग विदेशों से कर्ज ही लेंगे देश को मजबूत तो नहीं ही बनाएंगे
वेंकैया नायडू ने भी आज बोल दिया है 2017 का कैलेंडर जारी करके " मेरा देश बदल रहा है,आगे बढ़ रहा है "
बात तो सही है बढा नहीं तो ब्रिटेन को पीछे छोड़ा कैसे ??


By : Ajita Anuja

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Wednesday, 7 December 2016

क्या मोदी सरकार की नोटबंदी विफल रही?

14 लाख करोड़ के नकदी अर्थव्यवस्था में 11 लाख करोड़ बैंक खातों में आ चुके हैं, अनुमान है कि आगे भी और आ जाएंगे| तो इससे क्या निष्कर्ष निकालें- नोट बंदी विफल रहा ?
22 करोड़ अकेले जनधन अकाउंट हैं, 2.5 लाख के हिसाब से अकेला यही 55 लाख करोड़ खपाने में सक्षम हैं, यानि 14 लाख करोड़ का भी 4 गुना , उसमें महिलाओं का बैंक अकाउंट अलग है| यानि ऐसे देश में जहाँ हर घर में भगत सिंह जन्मे लेकिन मेरा घर छोड़ के टाइप वाला देशप्रेम हो ,तो यहाँ ऐसा होना एबनॉर्मल नहीं है|


RBI के observe, orient, decide, and act (OODA) की नीति से स्पष्ट हो चुका है कि असल प्लानिंग तो अब शुरू हुई है| उसके पहले कि सबसे बड़ी प्लानिंग यही दिखाई पड़ती है कि कोई प्लानिंग नहीं !
पहले भले असंभव रहा हो लेकिन अब के आकड़े ये बता सकते हैं कि कितना नोट छापना है, कितना कैशलेश होना है| जैसे रोज रोज नए नियम आ रहे हैं, कल RBI गाइडलाइन जारी कर डालेगी कि बस इससे ज्यादा नोट मार्केट में नहीं आने हैं , बाकी के जमा राशि का इस्तेमाल केवल और केवल प्लास्टिक मनी या चेक आदि के द्वारा ही संभव है तोदूसरे के अकाउंट का इस्तेमाल करके काले को सफ़ेद करने के अरमानों पे फिर पानी फिर जाएगा|
जनधन वालों कि धन निकासी की सीमा 10 हजार प्रतिमाह कर दी गयी, 2 साल लगेंगे 2.5 लाख निकालने में| जनधन अकाउंट के माध्यम से काले को सफ़ेद करने वालों के अरमानों पे पानी फिर चुका है| अब उन्हे बड़ा धैर्य रखना होगा और अब तो मुखबिरी द्वारा उनके पकड़े जाने की संभावना भी बहुत बढ़ गयी है और पकड़े जा रहे हैं|
तीसरी बात ,अब देखना ये है कि 30 दिसंबर तक अकाउंट में कुल कितना जमा होता है| लग तो ऐसा ही रहा है कि 14 लाख करोड़ से भी ज्यादा जमा हो जाएंगे यानि जाली नोटों की अर्थव्यवस्था का प्रभाव भी साक्षात दिख सकता है , ये पुनः RBI को दूसरे कड़े कदम उठाने के लिए आधार प्रदान करेगा|
चौथी बात कि नोट बंदी के बाद सरकार को ये पता चल चुका है कि देश में वास्तव में कितने अमीर, कितने मध्यम और कितने गरीब हैं| टैक्स बेस बढ़ाने में ये मिल का पत्थर साबित होगी| GST आने वाला है| 124 करोड़ के देश में एक झटके में टैक्स बेस को इतने कम समय में इस स्तर तक ले जाने में ये बड़ी सफलता होगी|
और आखिरी सबसे बड़ी बात कि जब तक ये सारे नोट बैंकों में हैं ,तब तक उसपर RBI का पूर्ण नियंत्रण है और ये भी निश्चित है कि कोई कितनी भी चालाकी लगा ले ,RBI और इन्कम टैक्स विभाग कालधन वसूल कर लेगी, चाहे जैसे ....चाहे न बदले जा सकने वाले नोटो के फॉर्म में या फिर अतिरिक्त कर और पेनाल्टी के फॉर्म मे| आप डाल डाल चलोगे , वो पात पात चलेंगे, आप हथकंडे बदलोगे , वो नियम बदलेंगे| और वही चल रहा है|
कुछ भी हो जाये, जहाँ 87% करेंसी को demonetise किया गया हो, वो भी डिजिटाईजेशन के युग में ,तो विफलता का कोई कारण नहीं दीखता, सफलता निश्चित है।

मूल लेखक :  Ashwini Kumar Verma

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ज्ञानवाणी (www.gyanvani.in) उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार के लिए ज्ञानवाणी किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
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