इराक ईरान युध्द 1980-88, एक अमेरिकी षडयंत्र

1980 के दशक में अमेरिका ने अपनी गिरती हुई अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए और पैसा कमाने के लिए एक ऐसा घृणित खूनी खेल खेला जिसके बारे में आज बहुत कम लोग जानते हैं। हम बात कर रहे हैं इराक ईरान युध्द की जो कि 1980 से 1988 तक चला तथा कुल 90 लाख लोगों के खून से इराक एवं ईरान की धरती रंग गई

बिना किसी बड़े कारण के ये दोनों देश लगभग एक दशक तक लड़ते रहे और इस युद्ध से अमेरिका तथा अन्य सहयोगी हथियार निर्यातक देश मोटी कमाई करते रहे और अन्त में यह युद्ध अनिर्णीत समाप्त हुआ। जानिए कैसे अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इराक और ईरान के बीच युद्ध को भड़का कर खूनी खेल खेला और संय़ुक्त राष्ट्र स्वयं तब तक इसका मूकदर्शक जब तक कि दोनों देश दीवालिया नहीं हो गये। इसका परिणाम यह हुआ कि ये दोनों देश आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता तथा कमजोर अार्थिक स्थिति का शिकार हैं। 

अमेरिकी अखबार द्वारा झूठी खबर से युद्ध की नींव डालना


1978 में अमेरिका के एक अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा की इराक ईरान की बॉर्डर पर जो की कंट्रोल लाइन है वहाँ काफी मात्रा में तेल का भंडार है। जब ये बात इराक़ और ईरान को पता लगी तो उनमे विवाद हो गया ये विवाद तनाव में बदल गया।

संयुक्त राष्ट्र प्रारम्भ में मूकदर्शक बना रहा


दोनों देश संयुक्त राष्ट्र पहुँच गए, और संयुक्त राष्ट्र में खुद अमेरिकी राजदूत ने उन्हें युध्द की सलाह दे डाली। उस समय इराक का राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन अमेरिका का खास दोस्त था। वही ईरान का झुकाव थोड़ा रूस की ओर था मगर रूस में आंतरिक तनाव शुरू हो गए थे रूस विदेश नीति पर फैसला लेने की स्थिति में नहीं था।

युद्ध का प्रारम्भ और अमेरिका की हथियार कम्पनियों का मोटा मुनाफा


ईरान को अकेला समझकर सद्दाम हुसैन ने युध्द छेड़ दिया, 10 सालो तक दोनों देश कुत्ते बिल्ली की तरह लड़े। दोनों एक ही संस्कृति, एक ही धर्म के देश है मगर कुल 90 लाख लोगो को मार डालाअमेरिका की आधी कंपनियो ने ईरान को और आधी कंपनियों ने इराक को हथियार बेचे।

मोटा मुनाफा कमाने के बाद अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र की युद्ध विराम की अपील


10 साल जब दोनों लड़ चुके थे और अमेरिका के हथियार बिक गए तो अमेरिका ने सुलह करवा दी, अमेरिका ने यह सुझाव दिया की वहाँ खुदाई करते है और जितना भी तेल निकलेगा उसे दोनों देश आधा आधा बाँट लेना। तो भाई ये बात आप 10 साल पहले भी बोल सकते थे तब तो अमेरिका ने ही युद्ध की सलाह दी थी।


अमेरिकी अखबार का दावा फर्जी निकला


अब खुदाई हुई तो रिपोर्ट आयी की वहाँ कोई तेल नही है इस बार दोनों ही देशो ने अपना सिर पटक लिया, जिस तेल के लिये 10 साल लड़े वो था ही नही। इराक ने वाशिंगटन पोस्ट के खिलाफ केस कर दिया मगर जुर्म तो अमेरिका में ही हुआ तो केस भी वही चला। अखबार ने माफ़ी मांग ली अदालत ने माफ़ कर दिया, मगर एक छोटी सी गलती ने 1 करोड़ लोगो का जीवन खत्म कर दिया।

युद्ध के बाद


यहीं से सद्दाम हुसैन अमेरिका के खिलाफ हो गया और बयानबाजी करने लगा (बाद में खाड़ी युद्ध भी अमेरिका ने ईराक पर फर्जी आरोप लगाकर ही किया), वहीं ईरान का भी विश्वास अब अमेरिका से उठ गया था। इसलिए ईरान ने एशिया की 3 महाशक्ति रूस, चीन और भारत से सम्बंध मजबूत किये मगर खाड़ी युद्ध में सद्दाम हुसैन की सरकार खत्म करने के बाद इराक आतंकवाद की राह पर निकल पड़ा।

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