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Quartered into snow; silent to remain,
When the bugle calls; They shall rise and march again.

Sunday, 20 November 2016

अजित डोभाल: रणनीतिक बदलाव के सूत्रधार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक के कार्यकाल से स्पष्ट है कि देश की सुरक्षा, आतंकवाद और विदेश नीति पर सरकार की सोच और दिशा पूर्ववर्ती सरकारों से बिल्कुल भिन्न है। देश-विदेश के पर्यवेक्षकों की मानें, तो इस बदलाव की रूप-रेखा तैयार करने और उसे अमली जामा पहनाने में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की नेतृत्वकारी भूमिका है। चाहे प्रधानमंत्री की विदेशी नेताओं से मुलाकात हो, या देश के भीतर सुरक्षा और आतंकवाद को लेकर कोई बड़ी बैठक हो, उनमें डोभाल की उपस्थिति जरूर होती है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में उनके महत्व का गंभीरता से संज्ञान भी लिया जाने लगा है। खबरों की सुर्खियों, मीडिया तथा सामाजिक आयोजनों से बचने वाले इस विख्यात पूर्व गुप्तचर के व्यक्तित्व और कार्यशैली पर एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है ...


वर्ष 2001 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के खिलाफ अमेरिका तथा अन्य मित्र देशों की सैन्य कार्रवाई आरंभ की थी। तालिबान ने तब अफगानिस्तान को ओसामा बिन लादेन जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकियों का गढ़ बना डाला था। उस अभियान में मदद के लिए बुश को भारत तथा पाकिस्तान के पूरे सहयोग की जरूरत थी, क्योंकि भारत जहां इस क्षेत्र का सबसे बड़ा एवं शक्तिशाली देश था, वहीं पाकिस्तान अमेरिका का भरोसेमंद होने के साथ अफगानिस्तान का निकटतम पड़ोसी भी था। अफगानिस्तान की मदद के लिए बने अंतरराष्ट्रीय फंड का पांचवां सबसे बड़ा दाता बनने के साथ ही अफगानिस्तान की बुनियादी संरचना के पुनर्निर्माण में बड़ा भागीदार होकर वहां की सेना, पुलिस तथा अन्य सरकारी कर्मियों को उनकी जिम्मेवारियों के लिए तैयार करने हेतु सबसे बड़ा प्रशिक्षक बन कर भारत ने बुश की अपील का उत्तर दिया।

मगर जब एक दिन अमेरिका ने अपनी फौजें अफगानिस्तान से वापस बुलाने का फैसला लेकर सभी संबद्ध देशों की एक बैठक इस उद्देश्य से बुलायी कि अफगानिस्तानियों को व्यवस्था के हस्तांतरण की बारीकियां तय की जा सकें, तो भारत को सिर्फ इसलिए अलग रखा गया कि पाकिस्तान ने अमेरिका को ऐसा ही करने हेतु मना लिया था। बदले में पाक ने अमेरिका को यह भरोसा दिया कि पाकिस्तानी धरती से अपनी कार्रवाइयां चलानेवाले आतंकी और साथ ही अफगानिस्तान में मौजूद पाक ‘संसाधन’ अमेरिका तथा उसके पश्चिमी मित्रों को अपना निशाना बनाने से बाज आयेंगे। पाकिस्तान द्वारा अंजाम दी गयी इस रणनीति का व्यावहारिक अर्थ यह था कि अलकायदा और तालिबान को भारत तथा कश्मीर को अपने निशाने पर लेने की पूरी छूट दे दी गयी।

कश्मीर और भारत में आतंकी उभार की यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसे जनवरी 2005 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के प्रमुख पद से रिटायर होनेवाले अजित कुमार डोभाल उसके बाद के नौ वर्षों की अवधि में भारतीय बुद्धिजीवियों को समझाते देश भर में घुमते रहे थे। विश्वविद्यालयों, पेशेवर निकायों, विभिन्न संगठनों के मंचों पर उनके व्याख्यानों के दौरान सभा भवन उत्सुक श्रोताओं से भरे रहते। तभी, उपर्युक्त भूमिका बताने के बाद, अपनी आवाज ऊंची करते हुए डोभाल लोगों को सहज ही इस निष्कर्ष तक पहुंचा देते कि ‘वक्त आ गया है, जब भारत को बचकानी शांतिप्रियता कूड़े में फेंक कर दुश्मन का सीधा मुकाबला करने की नीति अपनानी चाहिए।’
इस निष्कर्ष के साथ ही हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता। तब दिये गये उनके वे व्याख्यान आज तक सोशल साइटों पर अत्यंत लोकप्रिय हैं।



डोभाल के प्रशंसकों के लिए वे एक जीवित किंवदंती हैं। एक नायक हैं, जो अतुलनीय साहस के स्वामी होने के साथ ही भारत की सुरक्षा तथा रणनीतिक हितों पर बेबाक सोच रखते हैं। डोभाल के कार्यों पर 47 वर्षों तक नजर रखनेवाले उनके वरीय अधिकारी एवं पूर्व रॉ प्रमुख ए एस दुलत बताते हैं, ‘वह सर्वोच्च कोटि के खुफिया अफसर हैं।’ वे आगे कहते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के रूप में डोभाल को मिली शानदार सफलता की एक वजह सुरक्षा मामलों पर उनकी और मोदी की सोच का समान होना भी है। दुलत के अनुसार, ‘मैं यह कहूंगा कि वाजपेयी और ब्रजेश मिश्र की जोड़ी अत्यंत उत्तम थी और मोदी तथा डोभाल की जोड़ी उससे भी बेहतर है।’ चाहे मोदी के शपथ ग्रहण के अवसर पर सार्क देशों के प्रमुखों को आमंत्रण हो अथवा पिछले दिनों किया गया सर्जिकल स्ट्राइक, जानकार लोग विदेश नीति से संबद्ध मामलों में मोदी के प्रमुख फैसलों पर डोभाल की स्पष्ट छाप देखते हैं। यह सब डोभाल की उसी स्वप्न-शृंखला की कड़ियां हैं, जिसे भारत द्वारा एक जड़ताग्रस्त ‘मुलायम देश’ की छवि से बाहर निकल एक मजबूत राष्ट्र की भूमिका में उतरने के संदर्भ में डोभाल हमेशा से देखते रहे हैं।

डोभाल का पहले से कोई व्यक्तिगत राजनीतिक रुझान नहीं रहा। उनके साथी बताते हैं कि आइबी प्रमुख के रूप में वे तत्कालीन गृहमंत्री आडवाणी को रिपोर्ट किया करते थे और उस दौरान वे आडवाणी को तत्काल ही भा गये। जैसा स्वाभाविक था, इसने अनजाने ही उन्हें भाजपा के निकट ला दिया। यह भी सच है कि 2014 के संसदीय चुनावों में विदेशों में जमा कालेधन के मुद्दे पर भाजपा द्वारा प्रकाशित श्वेतपत्र डोभाल के शोधों पर ही आधारित था। अपनी सेवानिवृत्ति के बाद डोभाल ने 2009 में ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’ नामक एक थिंकटैंक की स्थापना की, जिसकी भाजपा के आदर्शों से निकटता थी। जल्दी ही इसे उन्होंने ऐसी पेशेवर बुलंदी दी कि पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी ने इसे विश्व के वैसे थिंकटैंकों में 20वां स्थान दिया, जिन पर नजर रखी जानी चाहिए। आगे 2015 में उसने इसे राजनीतिक संबद्धतायुक्त विश्व के श्रेष्ठ एनजीओ में 40वें पायदान पर रखा। सन 2014 में NSA बन जाने पर डोभाल ने इसका निदेशक पद छोड़ दिया।


राष्ट्रीय सुरक्षा परिदृश्य की व्यापक दृष्टि:

एम के नारायणन के बाद डोभाल ऐसे दूसरे IPS अफसर हुए, जो NSA के पद तक पहुंचे, जिसे साधारणतः भारतीय विदेश सेवा (IFS) के अफसरों के लिए सुरक्षित माना जाता था। तथ्य यह है कि लोगों को यह समझने में थोड़ा समय लगा कि यह NSA अपने पूर्ववर्तियों की तरह नहीं है। वे एक जासूस की तेज-तर्रारी के साथ ही एक राजनयिक के विदेशी अनुभव से भी लैस हैं, जिसे केवल सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ही समझा जा सका है। डोभाल के ही बैच के IPS अफसर और IB के पूर्व-प्रमुख के एम सिंह कहते हैं -
‘IFS अफसरों के लिए एक कार्यकाल किसी पड़ोसी देश में तथा दूसरा किसी विकसित देश में व्यतीत करना आवश्यक होता है। डोभाल को न केवल दोनों ही अनुभव प्राप्त हैं, बल्कि इस्लामाबाद में तो उन्होंने दोहरे कार्यकाल का चुनौतीपूर्ण अनुभव भी हासिल किया है। इसके अतिरिक्त पंजाब, मिजोरम तथा कश्मीर जैसे देश के प्रमुख विद्रोहों से निबटने के प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त होने के कारण डोभाल के पास देश के सुरक्षा परिदृश्य की कहीं व्यापक दृष्टि है।’


डोभाल का व्यक्तित्व:

आखिर क्या है अजित कुमार डोभाल का वास्तविक व्यक्तित्व?सरकारी सेवा के किसी अधिकारी के बारे में अनेक जानकारियां सहज सुलभ रहती हैं। इस अद्वितीय गुप्तचर के बारे में अधिकांश बातें अल्पज्ञात हैं। उनसे परिचित लोग बस इतना ही बता पाते हैं कि अपने काम के परे उनके लिए जीवन में कुछ विशेष नहीं है। सेना के एक इंजीनियरिंग अफसर के पुत्र के रूप में डोभाल का जन्म उत्तराखंड के ‘घिरी बनेल्स्यूँ’ गांव में हुआ था। अब इस गांव की लगभग सारी आबादी आजीविका की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुकी है। अभी कुछ ही महीनों पूर्व अपने गांव की यात्रा के दौरान उनके ग्रामीणों ने डोभाल से अनुरोध किया कि वे इस पलायन को रोकने के लिए कुछ करें।

IPS अधिकारी के रूप में डोभाल का पहला कार्यकाल 1968 में केरल के कोट्टायम में ASP के रूप में आरम्भ हुआ। केरल में उन दिनों हिंसक वामपंथी आंदोलनों का दौर था। कोट्टायम में आंदोलनकारियों को अभिप्रेरित कर इसे रोक देने में डोभाल सफल रहे। इसीलिए 1972 में IB के एक विशिष्ट ऑपरेशन के लिए जब कुछ सक्षम पुलिस अधिकारियों की जरूरत पड़ी तो केरल के दो अन्य IPS अधिकारियों के साथ डोभाल का भी चयन किया गया। बाकी दो अधिकारियों में एक उपर्युक्त केएम सिंह और दूसरे इएसएल नरसिंहन थे, जो बाद में छत्तीसगढ़, आंध्र तथा तेलंगाना के राज्यपाल बने. केरल सरकार ने IB के बुलावे पर डोभाल को छोड़ने से मना कर दिया। उन्हें पाने के लिए IB को बड़ा परिश्रम करना पड़ा।

मिजोरम में कमाल:
IB में अपने कार्यकाल के दौरान डोभाल ने मिजोरम जाने की इच्छा प्रकट की, जहां विद्रोही नेता लालडेंगा द्वारा मिजो जनता की स्वतंत्रता की घोषणा से अराजकता व्याप्त थी। उन्होंने अपनी पत्नी तथा दोनों बेटों को दिल्ली छोड़ा और मिजोरम में अपनी गोपनीय योजना पूरी करने में पांच वर्षों तक जुटे रहे। वे स्वयं एक मिजो विद्रोही का बाना धारण कर मिजो नेशनल आर्मी (MNA) के कमांडरों के करीबी बन गये। सन 1971 में बांग्लादेश मुक्तियुद्ध के नायक लेफ्टिनेंट जनरल जैकब तब मिजोरम में नियुक्त थे। डोभाल का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि हम सेना वाले उन्हें एक मिजो विद्रोही के रूप में ही जानते थे। यहां तक कि हम उन्हें मार गिराने की कोशिश में भी थे कि तभी एक दिन हमें उनकी असलियत बतायी गयी।

डोभाल के प्रभाव में आकर एक दिन पाया गया कि लालडेंगा की MNA के सात शीर्ष कमांडरों में से छह ने लालडेंगा के विरुद्ध बगावत कर दी और लगभग सभी मिजो विद्रोहियों ने भारतीय अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। पूरे मिजोरम में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। अंततः लालडेंगा ने शांति समझौते पर दस्तखत कर दिये और MNA को मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) का नया नाम दिया गया। तभी से मिजोरम लगातार पूर्वोत्तर का सबसे शांतिप्रिय राज्य बना हुआ है। इंदिरा गांधी की सरकार ने नियमों को शिथिल कर तब मात्र सात साल की सेवावधि वाले डोभाल को पुलिस मेडल से प्रदान किया था। स्वयं डोभाल मिजोरम में अपनी उपलब्धियों की सार्वजनिक चर्चा शायद ही कभी करते हैं। उनके सहकर्मी बताते हैं कि निडरता के साथ ही डोभाल का एक अन्य विशिष्ट गुण उनकी सच्चाई है, जो एक गुप्तचर अधिकारी के लिए असामान्य सी बात है।

उनकी अगली नियुक्ति दिल्ली में हुई, पर जोखिम उठाने को तत्पर डोभाल को जल्दी ही प्रथम सचिव, वाणिज्य, के रूप में इस्लामाबाद के भारतीय उच्चायोग में भेज दिया गया, जो वस्तुतः उनके असली उदेश्यों की गोपनीयता के लिए दिया गया एक छद्मनाम था। पाकिस्तान में अपने कार्यकाल के दौरान डोभाल अक्सर मुसलिम रूप धारण कर बाहर निकल अपना काम किया करते थे। दो मौकों पर वे वहां पकड़े जाने से बाल-बल बचे। एक बार लाहौर में एक धर्मपरायण बुजुर्ग मुसलिम ने उन्हें टोक दिया कि क्या आप हिंदू हैं? अपनी वेशभूषा के प्रति आत्मविश्वास से भरे डोभाल ने सीधे मना कर दिया, पर वह वृद्ध अपनी बात पर अड़ा रहा तो अंततः उन्हें सच स्वीकार करना ही पड़ा। तब उस बुजुर्ग ने डोभाल को बताया कि दरअसल आपके छिदे कान से मुझे यह स्पष्ट हुआ था। दूसरी घटना डोभाल द्वारा लाहौर में एक मुजरा देखने के वक्त घटी, जब पास बैठे एक व्यक्ति ने उन्हें बताया कि आपकी नकली मूंछें उखड़ रही हैं। डोभाल अब भारतीय उच्चायोग के लिए अपरिहार्य बन चुके थे। नियमों के विरुद्ध उन्हें इस्लामाबाद में दूसरे कार्यकाल के लिए भी पुनर्नियुक्त कर दिया गया।

पंजाब तथा कश्मीर में उपलब्धियां:
मगर डोभाल का सर्वोत्तम प्रदर्शन अभी बाकी था। पंजाब में खालिस्तान समर्थकों के विरुद्ध 1984 में स्वर्णमंदिर परिसर में हुए ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ के रूप में एक बड़ी गलती हो चुकी थी। वहां अकाल तख्त को पहुंचे व्यापक नुकसान से सिख जनमानस को बड़ा आघात पहुंचा था। उससे वहां विद्रोह और भी भड़क उठा। दूसरी बार, 1988 में जब एक बार फिर वहां कार्रवाई करने की आवश्यकता हुई, तो सरकार ने अतिरिक्त सतर्कता बरती और उसमें डोभाल को केंद्रीय भूमिका दी गयी। इस ‘ऑपरेशन ब्लैकथंडर’ के पूर्व तीन महीनों तक डोभाल वेश बदल स्वर्णमंदिर के बाहर मोची बने बैठे रहते और वहां आने-जानेवालों के साथ ही अंदर रहनेवालों पर भी नजर रखा करते। ऑपरेशन का दिन करीब आने पर उन्होंने पाकिस्तानी ISI के एजेंट का स्वांग किया और मंदिर के अंदर सीधे सशस्त्र उग्रवादियों तक पहुंच कर उन्हें शस्त्रास्त्रों की आपूर्ति तथा पाकिस्तान की पूरी मदद का आश्वासन दिया। मन ही मन वे वहां मौजूद उग्रवादियों की संख्या तथा उनकी मौजूदगी के स्थान नोट करते रहे। यह उनके द्वारा दी गयी सूचनाओं का ही कमाल था कि पुलिस तथा सुरक्षा बलों को बगैर मंदिर में प्रवेश किये ही अपनी कार्रवाई अंजाम देने में सफलता मिली। यही सफलता खालिस्तान आंदोलन के अंत की शुरुआत बन गयी। पुरस्कारस्वरूप डोभाल को शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार कीर्तिचक्र से सम्मानित किया गया, जो किसी असैन्यकर्मी को पहली बार मिल सका था।

IB के संयुक्त निदेशक के रूप में डोभाल कश्मीर में नियुक्त किये गये। उन्होंने उग्रवादियों से निबटने में कई अहम सफलताएं हासिल कीं, जिनमें लीक से हट कर सोचने और करने की उनकी क्षमता का बड़ा योगदान था। जम्मू-कश्मीर सरकार के वर्तमान मंत्री सज्जाद लोन जैसे तब के कई अन्य युवाओं तथा उग्रवादियों को उन्होंने राजनीति की मुख्यधारा में शामिल होने को राजी किया, ताकि भारत और कश्मीर की प्रगति में उन्हें अपना हित दिखे। सुरक्षाबलों के साथ सहयोग कर अनंतनाग तथा दक्षिण कश्मीर के बड़े इलाकों को हिजबुल के दबदबे से मुक्त कराने वाले पूर्व प्रति-उग्रवादी लियाकत खान कहते हैं कि डोभाल सदैव मुझे किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाने को कहा करते। यह डोभाल तथा लेफ्टिनेंट जनरल शांतनु सिन्हा की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने आत्मसमर्पित उग्रवादियों को लेकर प्रादेशिक सेना की एक बटालियन तैयार करने में सफलता प्राप्त की।

सन 1999 के अंत में इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण कर आतंकी अपहर्ता उसे कंधार ले गये थे। उसमें सवार यात्रियों को छुड़ाने के बदले मसूद अजहर तथा अन्य आतंकियों को सौंपे जाने की कार्रवाई के दौरान अपहर्ताओं से बातचीत करने में डोभाल ने प्रमुख भूमिका अदा की थी और यह उनके कैरियर का सबसे निराशाजनक अभियान था।

एक अलग किस्म के सलाहकार:

NSA के रूप में डोभाल ने पूर्ववर्तियों की तरह अपना कार्यालय प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के एक अंग के रूप में सीमित नहीं रखा। उसे पटेल भवन में एक पृथक पहचान दी। सुरक्षा तथा विदेशी मामलों में मोदी सरकार के फैसलों में उनकी अहम भूमिका होती है। कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय उनकी राय तथा जानकारी के बिना नहीं लिया जाता। ब्रिक्स अथवा बिम्सटेक शिखर सम्मेलन जैसे किसी भी मुख्य आयोजन में डोभाल को सुषमा स्वराज अथवा राजनाथ सिंह जैसे वरीय मंत्रियों के साथ बैठे देखा जा सकता है। उन्हें एक कैबिनेट मंत्री के समान ही सुविधाएं तथा लाभ प्राप्त हैं। सूत्र बताते हैं कि कई मंत्री उन्हें नियमित रूप से रिपोर्ट भी करते हैं। जिन लोगों को उनके कार्यालय तथा आवास में जाने का मौका मिला है, उनके अनुसार डोभाल गजब के पढ़ाकू हैं। उनका पुस्तक संग्रह नगर के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में एक है।

उनके निकटस्थ मित्र तथा सहयोगी केएम सिंह के अनुसार ‘अजित कभी छोटा नहीं सोचते।’ इससे लोग प्रायः उन्हें मदद न करने वाला तथा असामाजिक समझ लेते हैं। ‘हां, वे सामाजिक जीवन में यकीन नहीं रखते तथा अपने काम में डूबे रहनेवाले व्यक्ति हैं।’ अभी तक अजित डोभाल किसी विवाद के शिकार नहीं हुए। उनके इन्वेस्टमेंट बैंकर पुत्र शौर्य डोभाल के उत्थान पर बिकाऊ मीडिया ने शंका का वातावरण बनाने का निष्फल प्रयास भी किया। चालीस वर्षीय शौर्य डोभाल संघ तथा भाजपा समर्थित थिंकटैंक ‘इंडिया फाउंडेशन’ के सह-संस्थापक हैं, जिसके बारे में माना जाता है कि वह सरकार को प्रमुख नीतिगत सलाह देता है।

पाकिस्तान में घबराहट:
सितंबर में सेना के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद उनकी साख पाकिस्तान पहुंच चुकी है। वहां की सुरक्षा व्यवस्था में घबराहट फैली हुई है। मीडिया और टिप्पणीकारों के बीच बहस चल रही हैं कि अब पाकिस्तान को भारत के साथ शांति स्थापित कर लेनी चाहिए। दूसरी बहस का मुद्दा यह है कि हाफिज सईद और अजहर मसूद जैसे व्यक्तियों को हिरासत में ले लेना चाहिए। कुछ पाकिस्तानी कह रहे हैं कि क्UKI, को भी डोभाल की टक्कर का NSA नियुक्त करना चाहिए। कई ओर से नवाज शरीफ को चेतावनी भी दी जा रही है कि डोभाल की रणनीति पाकिस्तान को हर मोरचे पर घेर देने की है, ताकि पाकिस्तान कश्मीर में आतंकियों को न भेज सके। डोभाल का आतंक वहां सबके सिर चढ़ बोल रहा है।

(श्रीमती आशा खोसा के लेख का संपादित अंश साभार, अनुवाद : विजय नंदन)
मूल लेख : http://www.governancenow.com/news/regular-story/ajit-doval-nsa-national-security-advisor-pakistan-india-terrorism-kashmir
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Thursday, 17 November 2016

मरिन ले पेन-फ्रांस में दक्षिणपंथ और राष्ट्रवाद का उदय

दक्षिणपंथ का वैश्विक उदय हो रहा है, चार महीने बाद फ्रांस में होने जा रहे चुनावों में Marine Le Pen जीत दर्ज कर प्रेसिडेंट बनने में क़ामयाब हो सकती है। मरिन की जीत की संभावनाएं आज जितनी उजली हैं, उतनी पहले कभी नहीं थीं। और उसकी बढ़ती लोकप्रियता में निहित प्रतीकात्मकता का महत्व तो इससे भी ज़्यादा है।
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कौन है सोनम गुप्ता? क्यों सोनम बेवफा है? सोनम गुप्ता का खास इंटरव्यू Sonam Gupta Exclusive interview. Why #SonamGuptaBewafaHai?

आजकल हर तरफ सोनम गुप्ता की ही चर्चा है और लोग बेसब्री से जानना चाहते हैं कि आखिर कौन है ये सोनम गुप्ता और क्या सच में सोनम गुप्ता बेवफा है? आज आपकी मुलाकात होगी Sonam Gupta से इस खास इण्टरव्यू में और वे खुद बतायेंगी कि क्या वे बेवफा हैं और हां तो क्यों? नीचे दिये गये वीडियो को प्ले कीजिये और इण्टरव्यू का आनन्द लीजिये। Kya sach me Sonam Gupta Bewafa hai ..



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और अब सोनम के द्वारा भेजा गया एक शेर

जिस नोट पर मुझे बेवफा लिख दिया ऐ गालिब ..
सही समय मुझपर खर्च लेते तो मैं खफा ना होती, दफा ना होती..
यूँ ही कोई सोनम गुप्ता बेवफा नहीं होती।
Emotional*सोनम गुप्ता*।😂😂😝

दोस्तों ये तो हुई हंसी-मजाक की बात, लोगों के हंसी मजाक का मुद्दा बनना अलग बात है लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया में अगर इस विषय पर चर्चा हो तो बड़े ही दुर्भाग्य की बात है .. "सोनम गुप्ता की बेवफाई का सच..."
ये हैडलाइन है मेन स्ट्रीम मीडिया की.
.. ये राष्ट्रीय महत्व की वो खबर है जिसे मेन स्ट्रीम मीडिया कवर कर रहा है। ये प्राइम टाइम की प्राइम स्टोरी है। एक लड़की के नाम का मजाक उड़ाना ये स्तर है भारत के मीडिया का...काश चर्चा का विषय यह होता कि करेन्सी को खराब होने से कैसे रोका जाय

ता नहीं कब सुधरेगा भारत का मीडिया.. एक तो रवीश कुमार - एनडीटीवी जैसे देशद्रोही .. दूसरे अंजना ओम कश्यप -आज तक जैसे छिछोरे .. 90 प्रतिशत यही दो टाइप के है भारतीय मीडिया में और हां तहलका मैगजीन वाले पत्रकार .. तरुण तेजपाल जिनकी बलात्कार के मामले में गिरफ्तारी हुई थी .. यही है आज की भारत की मीडिया का चेहरा .. 

मेनस्ट्रीम मीडिया के द्वारा इस तरह की खबरें दिये जाने के कारण सोनम गुप्ता नाम की लड़किया भी मानसिक तनाव से गुज़र रही होंगी . कुछ वैसा ही जैसे शीला की जवानी वाले गाने के बाद शीला नाम की लड़कियों का हाल हुआ था। वह किसी की बहन है , किसी की बिटिया है किसी की पत्नी भी है....फेसबुक पर एक सोनम गुप्ता नाम की लड़की अफवाह से परेशान होकर . आत्महत्या करने की बात कर रही है ..

कल जिस वक़्त सीएनएन नासा पर एक बेहतरीन डाक्यूमेंटरी दिखा रहा था, हमारे चनेल सोनम गुप्ता पर अपनी खोजी पत्रकारिता का ऐतिहासिक उदाहरण पेश कर रहे थे। जब सोश्ल मीडिया की ट्रालिङ्ग मेंस्ट्रीम मीडिया मे खबर बन जाये तो समझिए मीडिया के दिन लदे। उम्मीद है कि ये जल्दी ही बदलेगा .. अगली पोस्ट में मिलते हैं ..

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नोट : यह आर्टिकिल किञ्जल्क तिवारी द्वारा ज्ञानवाणी के लिए लिखा गया है तथा सर्वाधिकार लेखकाधीन है। इसके पुनः प्रकाशन के लिए लेखक की पूर्व-अनुमति आवश्यक है।



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Wednesday, 16 November 2016

सचिन को "भारत-रत्न" और ध्यानचंद को? क्या ध्यानचंद की इतनी उपलब्धियां भारत-रत्न के लिए पर्याप्त नहीं है?

आज भारत में खेल का मतलब क्रिकेट और क्रिकेट का मतलब सचिन तेंदुलकर है...लेकिन एख वक्त था जब हिंदुस्तान का मतलब हॉकी और हॉकी का मतलब जादूगर ध्यानचंद हुआ करता था ..
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Tuesday, 15 November 2016

भारत और पाकिस्‍तान का बंटवारा - महज 50 से 60 दिनों के भीतर मारे गये थे 20 लाख लोग

जानिए कैसे थे वो 50 दिन जब धर्म के नाम हुए इस विभाजन में दंगे-फसाद और मारकाट से महज 50 से 60 दिनों के भीतर मारे गये थे 20 लाख लोग, 10 हजार से ज्‍यादा महिलाओं का अपहरण किया गया, उनके साथ बलात्‍कार हुआ, जबकि लाखों बच्‍चे अनाथ हो गए, कितने परिवार टूटे.. कितनी मांओं ने अपनी बेटियों 

दरअसल, भारत और पाकिस्‍तान का बंटवारा महज 50 से 60 दिनों के भीतर लाखों लोगों का विस्‍थापन था, जो विश्‍व में कहीं नहीं हुआ। 10 किलोमीटर लंबी लाइन में लाखों लोग देशों की सीमा को पार हुए। महज कुछ ही समय में एक स्‍थान पर सालों से रहने वाले को अपना घर बार, जमीन, दुकानें, जायदाद, संपत्‍ति, खेती किसानी छोडकर हिंदुस्‍तान से पाकिस्‍तान और पाकिस्‍तान से हिंदुस्‍तान गए।



आपको जानकार आश्‍चर्य होगा कि मनुष्‍य जाति के इतिहास में इतनी ज्‍यादा संख्‍या में लोगों का विस्‍थापन कभी नहीं हुआ। यह संख्‍या तकरीबन 1.45 करोड़ थी। 1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए।

धर्म के नाम हुए इस विभाजन में दंगे-फसाद और मारकाट के बीच मानवता जितनी शोषित, पीड़ित, और छटपटाई है उतनी किसी घटना में नहीं हुई। 10 हजार से ज्‍यादा महिलाओं का अपहरण किया गया, उनके साथ बलात्‍कार हुआ, जबकि सैंकड़ों बच्‍चे अनाथ हो गए, और 20 लाख से अधिक लोग विस्थापन के समय दंगों मे मारे गए।

एक अनुमान के मुताबिक विभाजन की इस रूह कंपा देने वाली और मानवजाति के इतिहास को शर्मिंदा कर देने वाली इस त्रासदी में तकरीबन 20 लाख से ज्‍यादा लोग मारे गए। इसके बाद आजाद हिंदुस्‍तान और आजाद भारत दोनों में ही विस्‍थापन के बाद अपना सबकुछ छोड आए लोगों को अपने जीवन को पटरी पर लाने के लिए, घरबार काम धंधा दोबारा जमाने के लिए शरणार्थी बनकर जिस अमानवीय त्रासदी से गुजरना पड़ा वह तो एशिया के इतिहास का काला अध्‍याय है।


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राजनीति और गिरोह

2014 से पहले इस देश नामक बस की ड्राइविंग सीट पर कांग्रेस बैठी थी..उस बस की फ्रंट सीटों पर कांग्रेसी पोषित मीडिया/ऐंकर/लिबरल/सिकुलर लोग कब्ज़ा जमाये थे और आम जनता पीछे की सीटों पर थी. अब कांग्रेस ने जैसीे ड्राइविंग की हम सब जानते हैं..लेकिन बस का माहौल उस गिरोह ने ऐसा बना दिया कि आम सवारियों को अगर धच्चियाँ भी लगे तो आगे कि सीटों पर बैठा कांग्रेसी पोषित मीडिया/ऐंकर/लिबरल/सिकुलर गठजोड़ जनता की तरफ मुंह करके बताने लगे कि रास्ता ही खराब है...ऊबड़ खाबड़ है...पत्थर आ गया..गड्ढे आ गए..पेड़ टूट कर गिर गया..और पीछे सीट पर बैठे आदमी सोचें कि ये भद्र जन सही ही कह रे होंगे..ये आगे बैठे हैं इन्हे सब दिख ही रहा होगा...ऐसा चलता रहा..जनता धच्चियाँ खाती रही लेकिन कांग्रेसी पोषित मीडिया/ऐंकर/लिबरल/सिकुलर गठजोड़ पर भरोसा भी करती रही कि ये सफर में असुविधा खराब ड्राइविंग की वजह से नहीं बल्कि अन्य कारणों से है.
लेकिन जब लगातार ऐसी ही असुविधाओं से जनता का बस में बैठना भी मुश्किल हो गया तो जनता के बीच में से एक आदमी आया और उसने कहा उसको भी ड्राइविंग का 15 साल का अनुभव है..अगर जनता चाहे तो वो इस बस को गंतव्य तक पहुंचा जा सकता है. कांग्रेसी पोषित मीडिया/ऐंकर/लिबरल/सिकुलर गठजोड़ ने उस आदमी का पहले मजाक उड़ाया..फिर उसे कोसा और डपट कर बैठ जाने को कहा...अब तक जनता भी आजिज आ चुकी थी तो उन्होंने कांग्रेसी पोषित मीडिया/ऐंकर/लिबरल/सिकुलर को इग्नोर कर उस आदमी को ड्राइविंग सीट पर बैठा दिया और पुराना ड्राइवर आगे बैठे लोगों में बैठ गया.
वो युवक बड़ी दक्षता से उस बस को चलाने लगा और जनता को फर्क साफ़ महसूस होने लगा. जनता के चेहरे पे आते संतोष के भावों से कांग्रेसी पोषित मीडिया/ऐंकर/लिबरल/सिकुलर गठजोड़ के पेट में मरोड़ें उठनी शुरू हुईं और उन्होंने नौटंकी चालु कर दी. अब जैसे ही वो युवक गाडी को किसी भी मोड़ पर ज्यों ही मोड़े आगे बैठा गिरोह त्यों ही इधर उधर गिर के "हाय रे मर गए" "हाय रे मार डाला" "हाय रे नहीं बचेंगे" चिल्लाने लगें..पीछे बैठे लोग सोचें यार अब धच्चियाँ भी कम लग रही हैं लेकिन ये आगे बैठे लोगों को क्या हुआ..ड्राइवर जैसे ही ब्रेक मारे ये गिरोह मजाक उड़ाने लगे कि देखो क्या नौसखिया ड्राइवर है गाडी की गति ही धीमी कर दी..और जब वो हाईवे पे तेज चलाये तो छाती पीट पीट रोना शुरू कर दें कि कितना असहिष्णु ड्राइवर है.
देश का मौजूदा हाल यही है...जनता को लग रहा है कि नया ड्राइवर सही ढंग से गाडी चला रहा है और उनको लक्ष्य तक पहुंचा देगा..लेकिन जो हाय रे मर गए वाला कांग्रेसी पोषित मीडिया/ऐंकर/लिबरल/सिकुलर आगे बैठा हुआ है वो सही सही पिक्चर पीछे जनता तक नहीं आने दे रहा..कुछ हैं जो आगे जाके टोह ले आते हैं और फिर इत्मीनान से ड्राइवर पर भरोसा करके बैठ गए हैं..कुछ क्रन्तिकारी उस गिरोह ने ही आम जनता के बीच में बिठा दिए हैं ताकि जब गिरोह रोये तो ये क्रन्तिकारी भी साथ में रोने लगें और भ्रम की स्थिति बरकरार रखी जा सके 😉
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Sunday, 13 November 2016

नरेन्द्र मोदी की Digital India,जन-धन योजना और विमुद्रीकरण के दूरगामी उद्देश्य


Digital India कार्यक्रम गली गली और खेत में फ़ेसबुक, व्हाट्सएप्प और ट्विटर चलाने के लिए नहीं है .. और उसी तरह .. जन-धन योजना के खाते फ्री में 15 लाख पाने ले लिए नहीं हैं .. इनका उद्देश्य बहुत बड़ा है .. ये भारत की तस्वीर बदल देगा ...

आजकल मुद्रा बदलकर भारतीय अर्थव्यवस्था का शुद्धिकरण किया जा रहा है। लोग चाव से इसमें भाग ले रहे हैं, असुविधाओं को हँस के सहते हुए। भारत के बैंक और डाकघर के कर्मचारी युद्धस्तर पर लगे हैं ..... मैं आज इस सबकी बड़ी तस्वीर दिखाना चाहता हूँ।



पहले जनधन योजना से हर एक नागरिक को जोड़े जाने की योजना बनी जिससे सबके पास बैंक में खाता हो। जब बैंक में खाता होगा तभी कोई डेबिट कार्ड से लेन देन कर सकेगा। जब डिजिटल इंडिया से पूरा देश इन्टरनेट से जुड़ जाएगा तो ये बैंक के खाते भी इन्टरनेट से जुड़े होंगे। हर डेबिट कार्ड इस्तेमाल करने वाले के पास नगद रखने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि इंटरनेट से जुड़े होने के कारण हर व्यवसायी और दुकानदार भी बैंक से जुड़ा होगा। अब उस दूकान पर रख दीजिये Card swiping instrument, अब सब खरीदने - बेचने वाले जुड़ जाएँगे बैंक से। हर दूकान पर GST बिलिंग की प्रोग्राम की हुई मशीन भी रखी होगी। जितने का बिल उतने का भुगतान। बैंक को जब ग्राहक मिलेंगे तो कर १५-२० गाँव पर एक बैंक होगा। दूर दराज़ के लोग digital India + bank खाते से जुड़े होंगे। किसी को नगदी रखने की जरूरत नहीं - सिर्फ छोटे खरीदारी जैसे फल, सब्ज़ी, नाइ, मोची या पंक्चर लगाने के कुछ काम के लिए नगदी चाहिए होगा ... इससे भारत का हर व्यवसाय सफ़ेद व्यवसाय होगा। दूकान से हुई हर खरीद बेंच का हिसाब रहेगा और देश की अर्थव्यवस्था सही राह पर होगी ....... 

आइये जाने कि इन सब से देश को और आम जान को जो दूर दराज़ गाँव के इलाके में रहते हैं उनको कैसे फायदा होगा ...
1. बैंक में पैसा रहने से उनका पैसा सुरक्षित होगा और ब्याज भी मिलेगा।
2. अकस्मात् के अवस्थाओं जैसे चोरी होना, आग लगना आदि की स्थिति में पैसे बैंक में होने से सुरक्षित रहेंगे। घर में रखने से नष्ट हो जाते हैं।
3. किसान को खाद, बीज की दिक्कत होती है, सरकारी या गैर सरकारी दूकान पे उनकी ये समस्या समाप्त हो जाएगी क्योंकि इसकी कालाबाज़ारी पर लगाम लगेगा।
4. खाद और बीज विक्रेता के हर खरीद बेंच का रिकॉर्ड होगा और वो चोरी करने से फंसेगा, किसान को लाइन लगाने या अफरा तरफी से मुकी मिलेगी।
5. अपने उपज को वो मंडी में बेंचने के बाद नगदी को वहीँ बैंक में सुरक्षित कर लेगा और नगद लेकर यात्रा करने के खतरों से बचेगा।
6. किसान को उचित मूल्य मिलेगा क्योंकि मंडी का भाव और पेमेन्ट का भी रिकॉर्ड होगा।
7. अक्सर सुनने में आता है कि पेट्रोल पंप या सुनार का खजांची पैसे जमा करने जा रहा था और लुटेरों ने लूट लिया। इससे लुटेरों का धंधा बंद होगा, जिससे जान माल सुरक्षित होंगे ...
8. प्रत्येक इंसान का देश के अर्थव्यवस्था में उचित योगदान होगा और उस योगदान का फल मिलेगा।
9. नगदी का व्यवसाय न्यूनतम होने पर कालाबाज़ारी, नक्सलवाद और आतंकवाद को पोषित होने वाले कारक बहुत कम होंगे जिससे सब सुरक्षित रहेंगे।
10. आधारिक संरचना बढ़ने, बैंक के कर्मचारी इन जगहों पर होने से कई अन्य उन्नत्ति के दरवाज़े खुलेंगे। अच्छे विद्यालय और महाविद्यालय खुलेंगे जिससे गरीब और गाँव गिरांव के बच्चों को अच्छी शिक्षा व्यवस्था होगी।
11. हस्पताल भी खुलेंगे - बैंक खाते से जुड़े बीमा योजना होने से इलाज की समस्या दूर होंगी ...

आदि आदि ...

अब इन सबके लिए सरकार की तरफ से योजना आएगी .. Digital India कार्यक्रम तेज़ी से चल रहा है, बैंक में खाते खुल रहे हैं, और भी योजनाएँ आएँगी जिससे इस सबको साकार किये जा सकेंगे ... ... इसके लिए बैंक की भूमिका महत्वपूर्ण होगी .. बैंककर्मी आतंरिक योद्धा होंगे जो नए शाखा खोलने और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल करने की विधि के प्रचार और शिक्षा के ध्वजवाहक होंगे। याद रखिएगा कि आने वाले दिनों में बैंककर्मी और बीमाकर्मी के ऊपर और बड़ी जिम्मेदारी आने वाली है और वो इस बढ़ते भारत के पुरोधा होंगे .....

इस सबके बीच हमारा-आपका .. आमजन की क्या भूमिका होगी .. बड़े शहरों में रहने वाले लोगों का जरूर कोई गाँव होता है। वो वहां आते जाते हैं। जिनका नहीं होता तो वो उनके घर में कामवाली, कूड़ा फेंकने वाला या मिलने वाले रिक्शावाला खोमचे वाला .. इनसे पाला जरूर पड़ता है ... अब सब लोग अपने गाँव ले लोगों को प्रेरित करे बैंक में खता खोलने का ... होने वाले फायदे का .. उनके बैंक से जुड़ने से उनके आने वाली पीढ़ी की उज्जवल भविष्य के फायदे बताएं .. डेबिट कार्ड के बारे में बताएँ .. कैसे इस्तेमाल होता है समझाएँ ... अक्सर गाँव और दूर दराज़ के इलाके में रहने वाले इससे डरेंगे, उनका डर भगाएँ ... उनको मज़बूती दें, उनका आत्मविश्वास और मनोबल बाधाएं ...

वो समय जब कांग्रेस गरीब को गरीब बना के, अनपढ़ को अनपढ़ रख के, लोकलुभावन नारे देके सत्ता सिख भोगती थी, वो दिन गए ... और कांग्रेस की B-टीम उर्फ़ वामपंथी भड़का कर एक समानांतर सत्ता चलाने का कुचक्र रचने वाले लोग हैं जो खुद को शब्दों का जाल फेंक कर बुद्धिजीवी और सर्वहार का मसीहा बताते फिरते हैं उक्त भी समय गया .... आइये राष्ट्रवादि ताकतें एक नए अध्याय की शुरुवात करें ... एक ताकतवर और विकसित भारत के निर्माण में योगदान दें ... ... ... आइये हम राष्ट्रवादी लोग लाइन में खड़े अंतिम व्यक्ति का सशक्तिकरण कर दें जिससे उनको भी हर लाभ मिले और वो जीवन जीने का मज़ा उठा सके ......

नोट: यह पोस्ट Ranjay Tripathi की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है. इस पोस्ट के सभी अधिकार इसके मूल लेखक Ranjay Tripathi के अधीन हैं तथा ज्ञानवाणी ने केवल इसे साभार प्रकाशित किया है। इसके पुनः प्रकाशन या कॉपी पेस्ट के लिए मूल लेखक की पूर्व अनुमति आवश्यक है।
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500 और 1000 के पुराने नोट बंद होने से काले धन पर क्या असर पड़ेगा?

कजरी और राहुल जैसे शातिर और चोरों के गिरोह के सरगना और उनके बहकावे में आए कुछ भोले भाले अच्छे लोग भी पूछते हैं कि पुराने हजार रुपए के नोट हटा कर नए दो हजार के नोट लाने से काले धन पर क्या असर पड़ेगा । बात तो वही रहेगी !!

मुझे लगता है कि हमारे विश्वविद्यालयों में तर्कशास्त्र की शिक्षा होती ही नहीं है । इसीलिए ऐसे शातिराना सवालों की गिरफ़्त में अच्छे लोग भी क़ैद हो जाते हैं ।

अरे भाइयों और बहनों, देवियों और सज्जनों, बात यह है कि पुराने बड़े नोटों का बहुत बड़ा प्रतिशत काले धन की लेन देन और ज़ख़ीरा बनाने में पहले ही इस्तेमाल हो चुका है । इस क़दम से पुराने काले धन का बहुत बड़ा हिस्सा एक झटके में बर्बाद हो जाएगा । लाखों करोड़ का काला धन एक झटके में धुँआ धुंआ । और ध्यान रहे यह ज़ख़ीरा एक दिन में इकट्ठा नहीं हुआ है । अगर नए ज़ख़ीरे बनाने की सुविधा भी हो तो नए ज़ख़ीरे को बनते बनते दसों साल लग जाएँगे ।




जो नए बड़े नोट आएँगे, वे अभी काला बाजार में इस्तेमाल नहीं हुए हैं । होंगे, जरूर होंगे पर इतनी जल्दी उतनी बड़ी मात्रा में नहीं हो पाएँगे, जितने अभी पुराने नोट की शक्ल में हैं । और ऊपर से सरकार और भी तमाम क़दम उठा रही है जिससे नए काले धन का ज़ख़ीरा बनाने में बहुत दिक्कत आएगी ।

और जो नए बड़े नोट आ रहे हैं उनकी संख्या पुराने बड़े नोटों के मुकाबले में बहुत कम होगी । फिलहाल देश की तक़रीबन अस्सी प्रतिशत मुद्रा पुराने बड़े नोटों की शक्ल में है । जब नए नोट आ जाएँगे तो यह प्रतिशत बहुत कम हो जाएगा । और ज़ख़ीरा बनाने में इससे भी दिक्कत आएगी । देश धीरे धीरे cashless अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ेगा ।

इसलिए पुराने काले नोटों की तुलना नए अभी तक सफ़ेद नोटों से करना और ऊलजलूल सवाल उठाना कम से कम नासमझी है या फिर देश को गुमराह करने की काला बाजारियों की साज़िश का हिस्सा है ।

देश में शिक्षा का क्या स्तर है, इस एक बात से ज़ाहिर है कि किसी युवा स्त्री ने जब यही भोला भाला सवाल NDTV पर एक पैनेल डिस्कशन में पूछा तो इतनी सीधी सी बात का सीधा जवाब देने के बजाय स्टेट बैंक के एक भूतपूर्व बहुत बड़े अधिकारी बड़े नोटों की महिमा का बखान करने में लग गए । हमारे यहाँ फ़ोकस करने की, to the point precise बोलने की, ट्रेनिंग ही नहीं है ।

भोला भाला होना बहुत बड़ा गुण है । पर भोला भाला होने के लिए मूर्ख होना कोई आवश्यक शर्त नहीं है, मित्रों ।



नोट: यह पोस्ट प्रदीप सिंह की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है. इस पोस्ट के सभी अधिकार इसके मूल लेखक प्रदीप सिंह के अधीन हैं तथा ज्ञानवाणी ने केवल इसे साभार प्रकाशित किया है। इसके पुनः प्रकाशन या कॉपी पेस्ट के लिए मूल लेखक की पूर्व अनुमति आवश्यक है।

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Friday, 11 November 2016

उत्तर भारत में नमक बंद होने की अफवाह-कई इलाकों में नमक 150-200 रुपये में बिका

अभी दस रुपये के सिक्के बंद होने का शोर थमा नहीं था कि पूरे उत्तर भारत में नमक नमक बंद होने की अफवाह फैलाई जा रही है, इसका असर यहां तक है कि कई जगह 400 रु तक नमर बेचा जा रहा है और अफरा तफरी फैला कर उपद्रव फ़ैलाने की कोशिश की जा रही है। सीएम अखिलेश यादव ने इसे अफवाह बताते हुए लोगों ने ध्यान न देने की अपील की है।


यूपी में किसी शरारती तत्व ने ये अफवाह फैलाई है की नमक खत्म हो गया पूरी जनता दुकान में जाकर 200 रुपये किलो नमक खरीद रहा है अरे जब लोग एक एक बोरी नमक ले आएंगे तो दुकान में तो नमक खत्म ही होगा ये किसी गंदे इंसान की चाल है। अरे समुन्दर थोड़े सूख गए है की नमक खत्म होगा
अफवाह फैलाया जा रहा की देश में नमक खत्म हो रहा जिसका फायदा कुछ मौकापरस्त दुकानदारों ने उठा लिया और आनन फानन में 200-400 ₹ में लोगो ने नमक उठा लाया !

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि जो भी झूठी अफवाह फैला रहे है की नमक महंगा हो गया है, उन अफवाह फ़ैलाने वालो पर सख्त से सख्त कार्यवाही होगी, कृपया अनुरोध है देश का माहौल ख़राब करने की कोशिश ना करे अन्यथा सजा के लिए तैयार रहे।

लखनऊ में काम करने वाले सुरेश बताते हैं, “कुछ देर पहले मेरी चाची को फोन आया नमक खरीदने के बाद में पूछ रही थी, बता रही थी कि उनके इलाके में खड़े नमक की बोरी 400 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि पैकेट वाला नमक 80-100 प्रति किलो में बिक रहा है, मैने उनसे कहा सब अफवाह है।” 

कई जगहों पर दुकानों पर भारी भीड़ जमा हो गई। पुलिस ने मौजूद लोगों को समझाने की कोशिश की, लेकिन नहीं मानने और हंगामा करने पर पुलिस को लाठियां फटकारनी पड़ीं। पुलिस और प्रसाशन ने साफ कहा है अफवाह फैलाने वालों पर कार्रवाई की जाएगी।
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मोदी जी की ये बाईपास सर्जरी सुनहरे शब्दो से इतिहास मे दर्ज होगी

1968 से पहले दिल की धमनियों मे रुकावट लाइलाज़ बीमारी थी। उस वक्त की बॉलीवुड़ फिल्मो में किसी ना किसी की दिल की बीमारी से मौत हो ही जाती थी। 1968 में अमेरिका में अर्जेन्टीना मूल के Dr. René Gerónimo Favaloro ने बाईपास सर्जरी की ख़ोज़ की। Dr. Favaloro ने धमनियो मे अवरोधो को बाईपास करके खून के सामान्य बहाव को को पक्का किया। बाईपास सर्जरी का आज भी उतनी ही कारगर है।.......


अगस्त 1944 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एक समय ऐसा आया जब मित्र देशो की सेनाओ का आगे बढना रुक गया। ऐसे मे General George Patton ने रणनीति को बदला और बेल्जियम में जर्मनी की मजबूत किलेबन्दी को बाईपास करते हुए तेजी से राईन नदी को पार करते हुए जर्मनी मे प्रवेश किया। ये बाईपास की रणनीति इतिहास में दर्ज हो गयी।

सरकार बनने से अब तक मोदी को सबने पानी पी पी कर कोसा... 'दामाद जी अब तक क्यू बाहर है' 'काले धन का क्या हुआ'...... मोदी जी ने सबको बाईपास करते हुए अपना लक्ष्य हासिल किया और कर रहे है। मजबूत Economy, काले धन पर रोक और दामाद जी, सासू माँ कोई पूछने वाला नही..........

ये बाईपास भी सुनहरे शब्दो से इतिहास मे दर्ज होगा

नोट: यह पोस्ट Himanshu Sharma की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है. इस पोस्ट के सभी अधिकार इसके मूल लेखक Himanshu Sharma के अधीन हैं तथा ज्ञानवाणी ने केवल इसे साभार प्रकाशित किया है। इसके पुनः प्रकाशन या कॉपी पेस्ट के लिए मूल लेखक की पूर्व अनुमति आवश्यक है। मूल पोस्ट https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=10209196051153117&id=1075785637
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डोनाल्ड जॉन ट्रम्प आपकी ही पैदाइश है तो अब भुगतना भी आपको ही पड़ेगा


9/11 वर्ल्ड ट्रेड हमले के बाद पूरी दुनिया ने मजहबी उन्माद की भयावहता को देखा. लगभग उसी समय ब्रिटेन समेत यूरोप के कई मुल्कों में अमेरिका की ही तरह कई आतंकी हमले हुए. ये वही दौर था जब पूरी दुनिया ने आतंकवाद और इस्लाम को एक-दूसरे का पर्याय मानना शुरू कर दिया था. इस खौफ के नतीजे में गैर-मुस्लिमों द्वारा कुरान शरीफ, इस्लाम और मुस्लिम मानसिकता को समझने का दौर शुरू हुआ. क्रूसेड के समय से आज तक लगातार कोशिश करके ईसाईयत ने इस्लाम को ऐसे मजहब के रूप में पेश करने में सफलता पा ली थी जो सिवाय तलवार किसी और रास्ते पर विश्वास ही नहीं रखता और न ही अपने अलावा किसी और मजहब या मत को मानने वाले को बर्दाश्त कर सकता है. ईसाईयत द्वारा स्थापित इस तथ्य को जेहन में लेकर जब वहां का एक ईसाई इस्लाम का अध्ययन करने गया तो उस ईसाई मानस ने इस्लाम को ठीक वैसा ही पाया जैसा चर्च ने उनको आज तक बताया था. ऊपर से जाकिर नाइक जैसे उन्मादी मजहबी प्रचारकों ने लगातार पश्चिमी लोगों को धमकाते हुए ये कुरानी भविष्यवाणी सुनाई कि one day islam will dominate the world. बराक "हुसैन" ओबामा राष्ट्रपति थे , इसलिये अमेरिकी 'कुछ अच्छा हो सकता है' की कल्पना भी नहीं कर सके और इस डर और खौफ़ ने अमेरिका और यूरोप में मजहब परिवर्तन कर ईसाई से मुस्लिम बनने वालों की बाढ़ ला दी. रोज़ ये ख़बरें आने लगी कि अमेरिका और यूरोप में इस्लाम सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला मजहब है. स्वाभाविक है जिन्होंने मजहब तब्दील की वो इस्लाम की शिक्षा से प्रभावित नहीं थे बल्कि उनमें भी वही डर था जो फतह-मक्का के दिन मक्का के काफिरों के अंदर था. ये मतांतरित हुए सब लोग इस इंतज़ार में थे कि कोई तो मसीहा आये जो one day islam will dominate the world के भयावह खौफ से उन्हें बाहर निकाले.

पिछले डेढ़-दो दशकों से लगातार हो रहे आव्रजन और फ़्रांस में हुए जेहादी उन्मादी प्रदर्शनों से हतप्रभ अमेरिकियों और यूरोप को धीरे-धीरे ही सही ये डर हो गया था कि कहीं इस्लाम दुबारा जाग न उठे और उनके लिये सियासी खतरा न बन जाये और फिर कहीं यूरोप पर दुबारा हमलावर न हो जाये इसलिये पश्चिमी दुनिया ने बड़ी समझदारी से काम लिया और उन्होंने पहला काम ये किया कि इस्लामी दुनिया से कर्नल गद्दाफी, सद्दाम, तालिबान, बिन-लादेन जैसे चेहरों को सामने कर दिया जो बाकी दुनिया तो क्या खुद उनके अपने मुल्कों के लिये नफरत के पर्याय थे और सारी दुनिया को बताया कि इस्लाम का असली चेहरा तो यही है जो तुम कर्नल गद्दाफी, सद्दाम, तालिबान, अल-कायदा और बिन-लादेन में देख रहे हो. उनके इस बात पर मुस्लिम विश्व को चाहिये ये था कि वो सामने आकर कहते कि हमारा चेहरा तालिबान, अल-कायदा और बिन-लादेन नहीं है पर मुसलमान यहाँ चूक गये और इनके समर्थन में छाती कूट-कूट कर इन्होने पूरी दुनिया में इस तथ्य को स्थापित करवा दिया कि हमारी पूरी उम्मत ही खबिसों की है और सिवाय वहशत, दरिंदगी और उन्माद हमें और कुछ आता ही नहीं है.

पश्चिमी विश्व को चाहिए यही था कि मुस्लिम विश्व खुद को तालिबान, अल-कायदा और बिन-लादेन जैसों को साथ खड़ा दिखाये, जब मुस्लिम ये गलती कर बैठे तो उन्होंने मुस्लिमों को उनके घरों में घुस के ठोकना शुरू किया, दुनिया ने उन्हें ठुकता तो देखा तो बजाये विरोध करने के कहा, ठीक करते हो, ये हैं ही खबीस लोग....और मारो.

अमेरिकी और ईसाई चर्च की बरसों की मेहनत और कोशिश पर बराक "हुसैन" ओबामा पानी फेर रहा था और हिलेरी से भी उन्हें वैसी ही आशंका थी इसलिये इस बार अमेरिका ने कोई गलती नहीं की और ट्रम्प को चुन लिया इस उम्मीद में कि ये शख्स उन्हें one day islam will dominate the world के खौफ से उबारेगा. इस उम्मीद में भी ट्रम्प चुने गये कि राजनैतिक इस्लाम की अगर कब्र खोदनी है तो ट्रम्प चाहिये, अपने ईसा और ईसाईयत के साथ रहना और जीना है तो ट्रम्प चाहिए.

ट्रम्प का आगमन विश्व को बहुत बड़े बदलाव की ओर ले जायेगा, ईसाई और इस्लामी विश्व फिर से आमने-सामने होंगी. क्रुसेड फिर होगा.चार साल बाद अगला कार्यकाल भी चाहिये इसलिये ट्रम्प 'घर में घुस कर मारो' की अमेरिकी परंपरा को दुगुनी गति देंगे, इजरायल तो खैर तैयार है ही, सऊदी अरब समझदार है इसलिये वो इस्लाम का मोह छोड़कर अपनी राष्ट्रीयता संभालेगा, हमारी यानि भारत की भूमिका दर्शक- दीर्घा में बैठकर खुशी का मौन इजहार करने तक सीमित रहेगी, बचे पाकिस्तान जैसे फर्जी इस्लाम वाले तो वो अब बुरी तरह रगड़े जायेंगे.

खैर कहना इतना ही है कि आपने पूरी दुनिया में अपने खिलाफ खुद ही नफरतों की जो फिजा पैदा की है उसके कीचड़ में आपको अब लोटना पड़ेगा. सद्दामों और बिन-लादेनों के लिये छाती कूटने की सजा तो खैर मिलेगी ही. डोनाल्ड जॉन ट्रम्प आपकी ही पैदाइश है तो अब भुगतना भी आपको ही पड़ेगा.

खुदा खैर करे...शुभकामनाएं

~ अभिजीत

नोट: यह पोस्ट Abhijeet Singh की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है. इस पोस्ट के सभी अधिकार इसके मूल लेखक Abhijeet Singh के अधीन हैं तथा ज्ञानवाणी ने केवल इसे साभार प्रकाशित किया है। इसके पुनः प्रकाशन या कॉपी पेस्ट के लिए मूल लेखक की पूर्व अनुमति आवश्यक है। मूल पोस्ट https://www.facebook.com/abhijeet.singh.370/posts/1231697766894515
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बदलते भारत की एक तस्वीर-भारत सच में बदल रहा है

बहुत कुछ है इस देश में जो बदलने लायक है और बदला जाना भी चाहिए. आज नाई की दूकान पर गया. (मैं बृहस्पतिवार या कोई अन्य वार के दिन ये नहीं करना चाहिए जैसी चीज़ें नहीं मानता, तब तक जब तक उस वार से मेरी खुद की कोई आस्था जुड़ी हो). नाई बीस-बाईस साल का मुस्लिम लड़का. आज भारत में चारों तरफ अगर सबसे बड़ा मुद्दा है तो वह यही नोटों से सम्बंधित मुद्दा है. यही मुद्दा वहाँ भी था. सभी थोड़े परेशान थे, खासकर वे जिनके घरों में लोग बीमार हैं या जिनके यहाँ शादियाँ हैं वे सरकार के इस त्वरित कार्यवाहीसे खासे नाराज भी थे, लेकिन आम जनमानस परेशानी के बावजूद नाराज़ नहीं था. पहली बार मैंने देखा कि अच्छे कामों में लोग वास्तव में पीड़ा में भी आनन्दित होते हैं.


हाँ तो नाई की दूकान में भीड़ छंटी. भीड़ ख़त्म होने पर मैं आखिरी ही बचा. उस युवक ने कहा कि अगर मोदी दोबारा आया भाई साहब तो देश सुधार देगा. मेरे लिए यह एक नया अनुभव था. क्या भारत सच में बदल रहा है? मुझे सालों बाद कोई ऐसा मुस्लिम मिला था जो परेशानी के बावजूद मोदी को गोधरा के लिए नहीं कोसता? वह एक लड़का मेरे लिए बदलते भारत की तस्वीर था.

सड़कों पर, दूकानों पर, शराब के ठेकों पर, सुनारों के यहाँ भीड़-भाड़ कम दिखी. बैंक्स को छोड़ दें तो बिज़नस या यूँ कह लें विलासिता का मार्केट मंदा है. लोग कैश को बचा कर रख रहे हैं. यहीं से लगता है कि भारत को बदला भी जा सकता है. हम मार्केट हैं, लेकिन मार्किट होने के बावजूद हम चाहें तो उपभोक्तावाद के चरम से आबद्ध होने से बचे रह सकते हैं. विलासिता अकाट्य है, लेकिन यह विलासिता अगर प्लास्टिक मनी के ज़रिये हो तो निश्चित ही ट्रैक किये जाने में आसानी है. आप नोट खरचें लेकिन आवश्यक आवश्यकताओं पर, उसे रख कर दूसरों को जलाएँ नहीं. उसे दूसरों से लूट कर अनट्रेसीएबल करने के लिए उसे घरों में छुपा कर मत रखें, यह सरकार का बड़ा स्पष्ट सा सन्देश है. सच में भारत को बदला जा सकता है.

आज लोग लंबी-लंबी लाइन्स में पैसा जमा करने के लिए खड़े हैं. अच्छे-अच्छे ब्रांडेड कपडे पहने लोग अपने घर के सात-आठ अकाउंट होल्डरों के साथ आए हैं, उन्हीं ब्रांडेड लोगों के आगे पीछे टुटही चप्पल पहने गरीब भी खड़ा है, उसके पैसे कम हैं, लेकिन क्या यह किसी मायने में तथाकथित वामी-समाजवादी मान्यताओं वाली पार्टियों के मुँह पर तमाचा नहीं है?

सरकारें बहुत सारा काम करती हैं. उनका किया-धरा तब तक बेकार है जब तक समाज उसमें भागीदारी न करे, जनता उसे समझे नहीं.

अभी तक मैंने मनमोहन सिंह जी का कोई एक्सपर्ट कमेंट इस मुद्दे पर नहीं सुना. देश के प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी कमज़ोरी से मुझे जितनी नाराज़गी रहा करती थी उतनी ही उनकी विद्वता से मैं प्रभावित रहता था. उनका इस विषय पर खुल कर न बोलना मैं इसी तथ्य का प्रमाण मानूंगा कि भारत के बुद्धिजीवी भी अगर अपनी पार्टीगत सोच के गुलाम हैं तो वे क्या नैतिक बल रखते हैं सामान्य मोदी स्नेही जनता को भक्त कहने का? आखिर में सभी मुद्दों पर सोचने के बाद लोग अपनी पार्टियों के आदेश या अपने राजनैतिक अस्तित्व के लिए कैसे 'सब तो ठीक लेकिन 15 लाख नहीं आए' जैसा 'जुमला' फेंक सकते हैं? आखिर वे कैसे जनता के पीड़ादायक आनंद को पीड़ादायक कष्ट दिखाने के लिए भड़काना जारी रख सकते हैं?

यह आखिरी तस्वीर निराश करती है. इसी निराशा के बीच मुझे वह बाईस साल का नाई दोबारा याद आ जाता है और फिर मुझे लगने लगता है,

वाकई_बागों_में_बहार_आएगी




नोट: यह पोस्ट उजबक देहाती विकामी की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है. इस पोस्ट के सभी अधिकार इसके मूल लेखक उजबक देहाती विकामी के अधीन हैं तथा ज्ञानवाणी ने केवल इसे साभार प्रकाशित किया है। इसके पुनः प्रकाशन या कॉपी पेस्ट के लिए मूल लेखक की पूर्व अनुमति आवश्यक है। मूल पोस्ट : https://www.facebook.com/ujbak.dehati/posts/209628879475005
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Thursday, 10 November 2016

क्या मोबाइल फोन से आपको कैंसर हो सकता है? Do mobile phones cause cancer?

क्या आपका मोबाइल फोन वास्तव में आपको हानि पहुंचा सकता है? अभी तक इसका कोई प्रमाण नहीं है कि मोबाइल फोन का उपयोग आपको कैंसर से ग्रसित कर सकता। आइये जानते है इस मामले में भौतिकी क्या कहती है?




मोबाइल फोन 800 से 2600 मेगाहर्टज् आवृत्तियों के बीच की रेडियो और माइक्रोवेव विकिरणों का उत्सर्जन व ग्रहण करते हैं। (यह आपके देश और मोबाइल ऑपरेटर के आधार पर भिन्न भिन्न हो सकता है) 


सेलफोन द्वारा उत्सर्जित विकिरण नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन के वर्ग में आती है। नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन के वर्ग में आने वाली विकिरणों में इतनी ऊर्जा नहीं होती है कि वे हमारी कोशिकाओं के लिए हानिकारक हों। दृश्य प्रकाश, अवरक्त किरणें (जो आपके टीवी के रिमोट में उपयोग होती हैं), माइक्रोवेव (जो आपके ओवन तथा मोबाइल फोन में उपयोग की जाती हैं) तथा रेडियो किरणें (जो रेडियो संचार, रडार आदि में उपयोग की जाती हैं), सभी नॉन आयोनाइजिंग रेडिएशन या अन-आयनिक विकिरणे हैं।

आयनिक विकिरणें या आयोनाइजिंग रेडियेशन वे किरणें होती हैं जिनमें इतनी अधिक ऊर्जा होती है जो किसी परमाणु से टकराने पर इलेक्ट्रॉन को निकाल देती है या दूसरे शब्दों में आयनीकृत कर देती है। इस प्रकार की विकिरण से अधिक प्रभावित होने पर यह हमारी कोशिकाओं तथा डीएनए को विकृत कर देती है एवं प्रायः शरीर को जला सकती है, घायल कर सकती है व हमें बीमार कर सकती है और यहां तक कि कैंसर तक पैदा कर सकती है वहीं नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन अधिकतम गर्मी पैदा कर सकती है जिसका उपयोग हम माइक्रोवेव में करते हैं। माइक्रोवेव में हम 600 से 100 वाट ऊर्जा का उपयोग करते हैं वहीं आपका मोबाइल फोन 2 वाट से भी कम ऊर्जा का उपयोग करता है।

वैज्ञानिकों अभी तक ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं मिली है जिससे कि मोबाइल फोन के उपयोग से कैंसर उत्पन्न होता हो या आपको अन्य किसी तरह की स्वास्थ्य समस्या 
होती हो। पिछले 15 सालों से मोबाइल फोन बहुतायत मात्रा में (भारत में लगभग 10 साल से) इस्तेमाल किये जा रहे हैं पर अभी तक इसका कोई प्रमाण नहीं है कि मोबाइल फोन हमें नुकसान पहुंचा सकता है। 

हां यह बात अलग है कि कई मामलों में लोगों को मोबाइल पर झुककर टाइप करने या ज्यादा देर तक चैट करने से पीठ में दर्द की शिकायत पायी गई है लेकिन अभी तक मोबाइल फोन के विकिरण का मानव स्वास्थ्य पर कोई भी असर नहीं पाया गया है।

क्या आप जानते हैं?


हम सभी किसी न किसी रूप में थोडीं मात्रा में आयनिक विकिरण के सम्पर्क में आते हैं, जैसे सूर्य से आने वाली कॉस्मिक किरणें, हमारी धरती द्वारा उत्सर्जित विकिरण और यहां तक कि सभी जीव-जन्तु और पौधे थोडीं मात्रा में आयनिक विकिरण का उत्सर्जन करते हैं लेकिन हमारा शरीर इस नगण्य मात्रा में आयनिक विकिरण से प्रभावित नहीं होता।
तो हमारा कहना यही है कि इस बात से निश्चिंत हो जाइये कि आपका सेलफोन आपको कैंसर का रोगी बना देगा, सेलफोन इस्तेमाल कीजिए लेकिन कुछ सावधानियों के साथ जैसे ज्यादा देर झुककर चैटिंग न करें, ये आपको अनचाहा पीठ दर्द दे सकता है तथा ज्यादा लम्बी बात करने के लिए इयरफोन का इस्तेमाल करें या फोन को कान से एक इंच दूर रखे ताकि आपका सिर मोबाइल फोन की गर्मी से गरम न हो।

अभी के लिए इतना ही, अगली पोस्ट जल्दी ही..


नोट : यह आर्टिकिल किञ्जल्क तिवारी द्वारा ज्ञानवाणी के लिए लिखा गया है तथा सर्वाधिकार लेखकाधीन है। इसके पुनः प्रकाशन के लिए लेखक की पूर्व-अनुमति आवश्यक है।



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Wednesday, 9 November 2016

आपका मोबाइल फोन कैसे काम करता है? How do mobile phones work?

1980 के दशक में मोबाइल फोन के आगमन ने संचार की दुनिया को ही बदलकर रख दिया लेकिन ये चमत्कार खुद मोबाइल फोन का नहीं बल्कि उस सेल्युलर नेटवर्क के आविष्कार का था जिसके आधार पर मोबाइल फोन काम करता है।
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Monday, 7 November 2016

NDTV से सुमंत भट्टाचार्य के 10 रैपिड फायर सवाल

राष्ट्रीय-सुरक्षा मामले में एनडीटीवी अपने ऊपर लगे बैन प्रकरण के विशिष्ट पहलुओं पर बहस से कतरा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार एवं बुद्धिजीवी Sumant Bhattacharya के एनडीटीवी से दस सवाल -



(1) क्या एनडीटीवी “केबल टीवी नेटवर्क 1994” की ही संवैधानिकता पर प्रश्न खड़े कर रहा है ?
(2) यदि हाँ, तो उसकी नज़र में संविधान के किस अनुच्छेद का उल्लंघन है ये क़ानून ?
(3) या, क्या इस “केबल टीवी नेटवर्क 1994” के अनुच्छेद 6 (1) की ही संवैधानिकता पर प्रश्न है, यदि हाँ तो संविधान की किस धारा के तहत ?
(4) या इस क़ानून की सरकार द्वारा की गयी व्याख्या पर प्रश्न खड़े कर रहा है एनडीटीवी, अगर हाँ तो कैसे ?
(5) या फिर इस क़ानून को बनाने के सरकार के अधिकार की ही संवैधानिकता पर प्रश्न खड़े कर रहा है, अगर हाँ तो संविधान के किस अनुच्छेद के तहत ?
(6) अथवा क्या वो ये मान रहा है कि एनडीटीवी पर इस क़ानून की प्रयोज्यता (applicability) असंवैधानिक है, अगर हाँ तो संविधान के किस अनुच्छेद के अनुसार ?
(7) क्या उसका ये मानना है कि पठानकोट-प्रसारण इस क़ानून के दायरे में ही नहीं आता, अगर हाँ तो कैसे ?
(8) या एनडीटीवी की शिकायत सिर्फ ये है कि ये प्रतिबन्ध तो ठीक है लेकिन चयनात्मक रूप से ‘सिर्फ’ एनडीटीवी पर लगाया जा रहा है और अन्य चैनलों पर नहीं ?
(9) अगर एनडीटीवी इस प्रतिबन्ध को असंवैधानिक मानता है तो वो न्यायालय क्यों नहीं जाता ?
(10) या कोई अन्य विशिष्ट पहलू जिस पर आपत्ति हो ?

एनडीटीवी केवल अपने ऊपर गलत रिपोर्टिंग के कारण लगे प्रतिबंध का रोना रो रहा है लेकिन सच यह है कि इसने देशद्रोही काम किया है और अब जनता से सच्चाई छुपाकर अपने कुकृत्यों पर पर्दा डाल रहा है।

NDTV और उनके उपासकों की दलील बड़ी मजेदार है..
फलाने ने गुनाह किया !
डिमकाने ने गुनाह किया !
मेँने भी उसी स्टाइल में बलात्कार किया !
फलाने और डिमकाने को नहीं पकड़ा ...
मुझे पकड़ लिया !
जब सबको छोड़ा तो मुझे भी छोड़ो !
जरा यह दलील जाकर कोर्ट में दो ..
बाबा का "क्रीमनल जस्टिस सिस्टम"
कायदे से समझा देगा जज !

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक कीमत होती है। निजी लाभ और लोभ से मुक्ति !
पहले खुद को मुक्त करें..फिर आवाज ऊँची करें !

पूरा लेख सुमंत भट्टाचार्य की फेसबुक वाल से साभार.. 
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भारत के "स्मॉग बम" से दहला पाकिस्तान

एक हफ्ते से दिल्ली में छाये कुहासे यानी स्मॉग का असर अब पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान तक भी पहुंचने लगा है. पंजाब से कुछ ही दूर स्थित पाकिस्तान के लाहौर और कराची से भी स्मॉग की खबरें आ रही है।
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