सचिन को "भारत-रत्न" और ध्यानचंद को? क्या ध्यानचंद की इतनी उपलब्धियां भारत-रत्न के लिए पर्याप्त नहीं है?

आज भारत में खेल का मतलब क्रिकेट और क्रिकेट का मतलब सचिन तेंदुलकर है...लेकिन एख वक्त था जब हिंदुस्तान का मतलब हॉकी और हॉकी का मतलब जादूगर ध्यानचंद हुआ करता था ..
.दुनिया भर में हॉकी के जादूगर के नाम से मशहूर महान हॉकी मेजर ध्यानचंद सिंह ने अपने हॉकी के कौशल से पूरी दुनिया को अपना कायल बना लिया था..अपने करियर में एक हजार से ज्यादा गोल करने का कारनामा करने वाले ध्यानचंद को कई अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है.. आज भारत रत्न को छोड दिया जाए तो कोई ऐसा अवॉर्ड नहीं है जो ध्यानचंद के खाते में ना हो..

असली भारत रत्न तो दद्दा ध्यानचंद जैसे होते हैं जो आज तक कभी नहीं हारे ,जिनके जैसा दुनिया में कोई दूसरा हॉकी खिलाडी पैदा नहीं हुआ | देश गुलाम होने के बावजूद दद्दा का अंग्रेज़ों के जहन में इतना खौफ था कि .. कि 1936 बर्लिन ओलंपिक्स में अंग्रेज़ों ने दद्दा के डर से अपनी टीम ही नहीं उतारी| सही मायनों में वे भारत रत्न नहीं अपितु विश्व रत्न थे। 

ध्यानचंद एक ऐसी हस्ती थे जिनके आगे दुनिया का सबसे क्रूर तानाशाह एडोल्फ हिटलर भी नतमस्तक हो गया था...ध्यानचंद की खेल की प्रतिभा को देखकर हिटलर उनके सामने जर्मनी की सेना में बड़े पद पर शामिल हो कर जर्मनी के लिए खेलने का प्रस्ताव रख दिया..लेकिन ध्यानचंद ने विनम्रता से हिटलर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया..इतना ही नहीं इसके बाद हिटलर ने ध्यानचंद की हॉकी स्टिक खरीदने की भी मांग की थी जिसके लिए वो मुंहमांगे दाम देने को तैयार थे.

लेकिन ये विश्व रत्न ध्यानचंद लगातार भारत सरकार की उपेक्षा का शिकार हुआ। ध्यानचंद और हॉकी को लगातार उपेक्षा का शिकार होना पड़ा और यह आज भी जारी है। ध्यानचंद ने अपने आखिरी इंटरव्यू में कहा था कि "When I die, the world will cry, but India's people will not shed a tear for me, I know them." अर्थात् जब मेरी मृत्यु होगी तो पूरा विश्व रो रहा होगा परन्तु भारत के लोगों की ऑखों से एक आंसू तक नहीं निकलेगा। मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। 

ध्यानचंद के कैरियर की कुछ खास बातें :-


1. स्वतंत्रता के पहले जब भारतीय हॉकी टीम विदेशी दौरे पर थी, भारत ने 3 ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते. और खेले गए 48 मेचो में से सभी 48 मेच भारत ने जीते.


2. भारत 20 वर्षो से हॉकी में अपराजेय था.हमने अमेरिका को खेले गए सभी मेचो में करारी मात दी इसी के चलते अमेरिका ने कुछ वर्षो तक भारत पर प्रतिबन्ध लगा दिया.

3. श्री ध्यानचंद जी की प्रशंसको की लिस्ट में हिटलर का नाम सबसे उपर आता है. हिटलर ने ध्यानचंद
जी को जर्मनी की नागरिकता लेने के लिए प्रार्थना की, साथ ही जर्मनी की ओर से खेलने के लिए आमंत्रित किया'उसके बदले उन्हें सेना का अध्यक्ष और बहुतसारा पैसा देने की बात कही. लेकिन जवाब में ध्यानचंद ने उन्हें कहा की मैं पैसो के लिए नहीं देश के लिए खेलता हूँ.

4.कैसे हिटलर ध्यानचंद के प्रशंसक बने? जब जर्मनी में हॉकी वर्ल्डकप चल रहा था. तब एक मैच के दौरान जर्मनी के गोल कीपर ने उन्हें घायल कर दिया. इसी बात का बदला लेने के लिए ध्यानचंद ने:टीम के सभी खिलाडियों के साथ एक योजना बनायीं और भारतीय टीम ने गोल तक पहुचने के बाद भी गोल नहीं किया और बॉल को वही छोड़ दिया. यह जर्मनी के लिए बहुत'बड़ी शर्म की बात थी.

5. एक मैच ऐसा था जिसमे ध्यानचंद एक भी गोल नहीं कर पा रहे थे . इस बीच उन्होंने रेफरी से कहा "मुझे मैदान की लम्बाई कम लग रही है" जांच करने पर ध्यानचंद सही पाए गए और मैदान को ठीक किया गया. उसके बाद ध्यानचंद ने उसी मैच में 8 गोल दागे.

6. वे एक अकेले भारतीय थे जिन्होंने आजादी से पहले भारत में ही नहीं जर्मनी में भी भारतीय झंडे को फहराया. उस समय हम अंग्रेजो के गुलाम हुआ करते थे भारतीय ध्वज पर प्रतिबंद था. इसलिए उन्होंने ध्वज को अपनी नाईट ड्रेस में छुपाया और उसे जर्मनी ले गए. इस पर अंग्रेजी शासन के अनुसार उन्हें कारावास हो सकती थी लेकिन हिटलर ने ऐसा नहीं किया.

7. जीवन के अंतिम समय में उनके पास खाने के लिए पैसे नहीं थे. इसी दौरान जर्मनी औरअमेरिका ने उन्हें कोच का पद ऑफर किया लेकिन उन्होंने यह कहकर नकार दिया की "अगर में उन्हें हॉकी खेलना सिखाता हूँ तो भारत और अधिक समय तक विश्व चैंपियन नहीं रहेगा." लेकिन भारत की सरकार ने उन्हें किसी प्रकार की मददनहीं की तदुपरांत भारतीय आर्मी नेउनकी मदद की.

8. एक बार ध्यानचंद अहमदाबाद में एक हॉकी मैच देखने गए. लेकिन उन्हें स्टेडियम में प्रवेश नहीं दिया गया स्टेडियम संचालको ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया . इसी मैच में जवाहरलाल नेहरु ने भी भाग लिया था.

9. आख़िरकार क्रिकेट के आदर्श सर डॉन ब्रेड मैन ने कहा "में ध्यानचंद का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ मेरे रन बनाने से भी आसानी से वे गोल करते है,"

10. गेंद उनकी हॉकी से इस तरह चिपकी रहती थी कि एक बार शक होने पर जापान में उनकी हॉकी स्टिक को तोड़कर भी देखा गया कि कहीं उसमें चुम्बक तो नहीं लगा है।

क्या ध्यानचंद की इतनी उपलब्धियां भारतरत्न के लिए पर्याप्त नहीं है? यह चोंकाने वाली बात है भारत की सरकार द्वारा उन्हें भारत रत्न नहीं मिला लेकिन लगभग 50 से भी अधिक देशो द्वारा उन्हें 400 से अधिक अवार्ड प्राप्त हुए.

नतमस्तक है हम ऐसी महान हस्ती को !!
क्या हम सब को मिल कर सरकार का ध्यान इस महान व्यक्ति की ओर आकर्षित नहीं करा सकते ?

नोट : यह आर्टिकिल किञ्जल्क तिवारी द्वारा ज्ञानवाणी के लिए लिखा गया है तथा सर्वाधिकार लेखकाधीन है। इसके पुनः प्रकाशन के लिए लेखक की पूर्व-अनुमति आवश्यक है।


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