आपका मोबाइल फोन कैसे काम करता है? How do mobile phones work?

1980 के दशक में मोबाइल फोन के आगमन ने संचार की दुनिया को ही बदलकर रख दिया लेकिन ये चमत्कार खुद मोबाइल फोन का नहीं बल्कि उस सेल्युलर नेटवर्क के आविष्कार का था जिसके आधार पर मोबाइल फोन काम करता है।



संचार माध्यमों के क्षेत्र में यह अब तक की सबसे बड़ी क्रांति मानी जा सकती है जिससे मानव सभ्यता ने विकास की एक नई छलांग लगा दी है। साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि आपका मोबाइल फोन बहुत कुछ उस रेडियो की तरह है जिसमें ट्रांसमीटर और रिसीवर दोनों लगा हो (जैसा कि हम अक्सर वॉकी-टॉकी आदि में प्रयोग करते हैं) परन्तु उससे थोड़ा अधिक उन्नत है।

कल्पना कीजिये आप अपने किसी मित्र को दूसरे शहर में कॉल करते हैं। जैसे ही आप यहां बोलते हैं, आपका फोन आपकी आवाज को माइक्रोफोन द्वारा ग्रहण करके उसे एक इलेक्ट्रिक सिग्नल में बदल देता है जो कि रेडियो तरंगों के माध्यम से दूसरी जगह भेजा जाता है और आपके मित्र का फोन इस सिग्नल को स्पीकर के माध्यम से उसे पुनः ध्वनि बदल देता है। बस यही मूल सिद्धांत है मोबाइल संचार के पीछे है जिसके द्वारा आप हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी दूसरे से बात कर सकते हैं।

मोबाइल फोन को स्थानांतरणीय (पोर्टेबल) बनाने के लिए एक छोटा एंटीना आवश्यक होता है जो कि लगातार अल्प मात्रा में ऊर्जा का उपयोग करके सक्रिय रहता है। आपका मोबाइल फोन यदि स्विच ऑन है और उपयोग में नहीं है फिर भी थोड़ी-थोड़ी देर पर एक सिग्नल पल्स भेजता रहता है और यही कारण है कि आपका फोन फ्लाइट मोड पर बहुत कम बैटरी खपत करता है क्योंकि फ्लाइट मोड पर यह इस प्रकार के सिग्नल भेजना बंद कर देता है और सेल्युलर नेटवर्क से बिल्कुल अलग हो जाता है।


ये सेल्युलर नेटवर्क ही आपको हजारों किलोमीटर दूर स्थित दूसरे सेलफोनों से संचार की सुविधा प्रदान करता है। सेल्युलर नेटवर्क बनाने के लिए पूरी पृथ्वी को छोटे-छोटे क्षेत्रों में बांट लिया जाता है जिन्हें सेल करते है। ये सेल षट्कोणीय आकार के क्षेत्र होते हैं और हर सेल का अपना एक बेस स्टेशन होता है। जब आप किसी मित्र के सेलफोन पर कॉल करते हैं तो सबसे पहले आपके क्षेत्र का बेस स्टेशन आपके फोन से निकले कमजोर सिग्नल को पकडता है और फिर आपके मित्र के नजदीकी बेस स्टेशन को रिले कर देता है। फिर यह स्टेशन उस सिग्नल को आपके मित्र के फोन तक पहुंचा देता है और आपकी आवाज उसके फोन पर सुनायी देती है। यदि आप बात करते समय एक बेस स्टेशन से दूसरे बेस स्टेशन के क्षेत्र में चले जाते हैं तो आपका फोन बिना आपकी कॉल को प्रभावित किये स्वतः दूसरे बेस स्टेशऩ को स्विच कर लेता है और आपकी बात होती रहती है।

सेल के उपयोग से एक और जटिल समस्या का समाधान हो जाता है। फोन नेटवर्क में रेडिये फ्रीक्वेसीज् की उपलब्धता सीमित होती है और एक समय में लगभग 800 रेडियो फ्रीक्वेंसीज् उपलब्ध होती है। आपके फोन को एक समय में कॉल करने के लिए दो फ्रीक्वेंसीज या आवृत्तियों की आवश्यकता होती है। एक आपकी आवाज को भेजने के लिए और दूसरी आवाज को प्राप्त करने के लिए। इस प्रकार एक समय में 400 लोग एक साथ बातचीत कर सकते हैं लेकिन सेलों के उपयोग से हर सेल पर इस आवृत्तियों का पुनः-प्रयोग हो जाता है और हर सेल पर इतनी ही संख्या में लोग एक साथ बात कर सकते हैं।


इसी कारण सेल्युलर नेटवर्क प्रतिदिन करोड़ों कॉल एक साथ जारी रख पाता है। जब कभी किसी सेल में रेडियों फ्रीक्वेंसी उपल्ब्ध नहीं होती तो आपको "नेटवर्क व्यस्त" बताया जाता है लेकिऩ ऐसा केवल उस समय होता है जब एक सेल के क्षेत्र में 400 से अधिक उपयोगकर्ता हों। यही कारण है कि कभी-कभी जैसे नव वर्ष या अन्य समय पर जब कॉल करने वालों की संख्या अत्याधिक हो जाती है और 400 तक पहुंच जाती है तो उस सेल के क्षेत्र में अन्य कॉल नहीं सम्भव हो पाते। इसी अव्यवस्था से बचने के लिए टेलीकॉम कंपनियां घनी आबादी वाले क्षेत्रों से सघन सेल स्थापित करती है ताकि ये असुविधा न हो।

अभी के लिए इतना ही, अगली पोस्ट जल्दी ही..

नोट : यह आर्टिकिल किञ्जल्क तिवारी द्वारा ज्ञानवाणी के लिए लिखा गया है तथा सर्वाधिकार लेखकाधीन है। इसके पुनः प्रकाशन के लिए लेखक की पूर्व-अनुमति आवश्यक है।



Comments