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Quartered into snow; silent to remain,
When the bugle calls; They shall rise and march again.

Friday, 11 November 2016

बदलते भारत की एक तस्वीर-भारत सच में बदल रहा है

बहुत कुछ है इस देश में जो बदलने लायक है और बदला जाना भी चाहिए. आज नाई की दूकान पर गया. (मैं बृहस्पतिवार या कोई अन्य वार के दिन ये नहीं करना चाहिए जैसी चीज़ें नहीं मानता, तब तक जब तक उस वार से मेरी खुद की कोई आस्था जुड़ी हो). नाई बीस-बाईस साल का मुस्लिम लड़का. आज भारत में चारों तरफ अगर सबसे बड़ा मुद्दा है तो वह यही नोटों से सम्बंधित मुद्दा है. यही मुद्दा वहाँ भी था. सभी थोड़े परेशान थे, खासकर वे जिनके घरों में लोग बीमार हैं या जिनके यहाँ शादियाँ हैं वे सरकार के इस त्वरित कार्यवाहीसे खासे नाराज भी थे, लेकिन आम जनमानस परेशानी के बावजूद नाराज़ नहीं था. पहली बार मैंने देखा कि अच्छे कामों में लोग वास्तव में पीड़ा में भी आनन्दित होते हैं.


हाँ तो नाई की दूकान में भीड़ छंटी. भीड़ ख़त्म होने पर मैं आखिरी ही बचा. उस युवक ने कहा कि अगर मोदी दोबारा आया भाई साहब तो देश सुधार देगा. मेरे लिए यह एक नया अनुभव था. क्या भारत सच में बदल रहा है? मुझे सालों बाद कोई ऐसा मुस्लिम मिला था जो परेशानी के बावजूद मोदी को गोधरा के लिए नहीं कोसता? वह एक लड़का मेरे लिए बदलते भारत की तस्वीर था.

सड़कों पर, दूकानों पर, शराब के ठेकों पर, सुनारों के यहाँ भीड़-भाड़ कम दिखी. बैंक्स को छोड़ दें तो बिज़नस या यूँ कह लें विलासिता का मार्केट मंदा है. लोग कैश को बचा कर रख रहे हैं. यहीं से लगता है कि भारत को बदला भी जा सकता है. हम मार्केट हैं, लेकिन मार्किट होने के बावजूद हम चाहें तो उपभोक्तावाद के चरम से आबद्ध होने से बचे रह सकते हैं. विलासिता अकाट्य है, लेकिन यह विलासिता अगर प्लास्टिक मनी के ज़रिये हो तो निश्चित ही ट्रैक किये जाने में आसानी है. आप नोट खरचें लेकिन आवश्यक आवश्यकताओं पर, उसे रख कर दूसरों को जलाएँ नहीं. उसे दूसरों से लूट कर अनट्रेसीएबल करने के लिए उसे घरों में छुपा कर मत रखें, यह सरकार का बड़ा स्पष्ट सा सन्देश है. सच में भारत को बदला जा सकता है.

आज लोग लंबी-लंबी लाइन्स में पैसा जमा करने के लिए खड़े हैं. अच्छे-अच्छे ब्रांडेड कपडे पहने लोग अपने घर के सात-आठ अकाउंट होल्डरों के साथ आए हैं, उन्हीं ब्रांडेड लोगों के आगे पीछे टुटही चप्पल पहने गरीब भी खड़ा है, उसके पैसे कम हैं, लेकिन क्या यह किसी मायने में तथाकथित वामी-समाजवादी मान्यताओं वाली पार्टियों के मुँह पर तमाचा नहीं है?

सरकारें बहुत सारा काम करती हैं. उनका किया-धरा तब तक बेकार है जब तक समाज उसमें भागीदारी न करे, जनता उसे समझे नहीं.

अभी तक मैंने मनमोहन सिंह जी का कोई एक्सपर्ट कमेंट इस मुद्दे पर नहीं सुना. देश के प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी कमज़ोरी से मुझे जितनी नाराज़गी रहा करती थी उतनी ही उनकी विद्वता से मैं प्रभावित रहता था. उनका इस विषय पर खुल कर न बोलना मैं इसी तथ्य का प्रमाण मानूंगा कि भारत के बुद्धिजीवी भी अगर अपनी पार्टीगत सोच के गुलाम हैं तो वे क्या नैतिक बल रखते हैं सामान्य मोदी स्नेही जनता को भक्त कहने का? आखिर में सभी मुद्दों पर सोचने के बाद लोग अपनी पार्टियों के आदेश या अपने राजनैतिक अस्तित्व के लिए कैसे 'सब तो ठीक लेकिन 15 लाख नहीं आए' जैसा 'जुमला' फेंक सकते हैं? आखिर वे कैसे जनता के पीड़ादायक आनंद को पीड़ादायक कष्ट दिखाने के लिए भड़काना जारी रख सकते हैं?

यह आखिरी तस्वीर निराश करती है. इसी निराशा के बीच मुझे वह बाईस साल का नाई दोबारा याद आ जाता है और फिर मुझे लगने लगता है,

वाकई_बागों_में_बहार_आएगी




नोट: यह पोस्ट उजबक देहाती विकामी की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है. इस पोस्ट के सभी अधिकार इसके मूल लेखक उजबक देहाती विकामी के अधीन हैं तथा ज्ञानवाणी ने केवल इसे साभार प्रकाशित किया है। इसके पुनः प्रकाशन या कॉपी पेस्ट के लिए मूल लेखक की पूर्व अनुमति आवश्यक है। मूल पोस्ट : https://www.facebook.com/ujbak.dehati/posts/209628879475005

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