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When the bugle calls; They shall rise and march again.

Saturday, 18 February 2017

कश्मीरी जिहादियों की बर्बरता और देशद्रोही पत्रकारों का भारत विरोधी रवैया

 सबसे पहले आप ये वीडियो देखिये.. इस वीडियो में सबसे आगे सेना की एम्बुलेंस जा रही है जिसमे हंदवारा में हुई मुठभेड़ में गम्भीर रूप से घायल मेजर सतीश सतीश दाहिया को अस्पताल ले जाया जा रहा है। एम्बुलेंस की सुरक्षा के लिए पीछे सेना की दो गाड़ियांं और चल रही हैं.. जैसे ही ये  किसी बस्ती से गुजरती हैं, स्थानीय कश्मीरियों द्वारा इसका रास्ता रोकने की पूरी कोशिश की जाती है..  हर जगह इन पर पथराव किया जाता है.. ताकि समय पर घायलों को अस्पताल पहुंचने से रोका जा सके। सेना को स्थानीय लोगों पर गोली चलाने या कोई भी कारवाई करने का आदेश नहीं है। 

अन्त में इसका परिणाम यह होता है कि मेजर दाहिया समय पर इलाज न मिलने के कारण वो इस दुनिया से चले जाते हैं। उनकी पत्नी शादी के तीन साल बाद ही विधवा हो जाती है। उनकी छोटी सी बेटी के सिर से पिता का साया हट जाता है।




 क्या मानवाधिकार का सारा ठीकरा सेना ने ले रखा है? इन क्रूर कश्मीरी जिहादियों का एक एम्बुलेंस पर पथराव  करने में तनिक भी मन नहीं डोला। क्या ये क्रूरता की पराकाष्ठा नहीं है? एक तरफ सेना पर पथराव करते हैं, दूसरी ओर मानवाधिकार का रोना रोते हैं और तो और कुछ देशद्रोही पत्रकार इनकी इस नापाक पत्थरबाजी को सही ठहराते हैं।

पिछले एक या दो दिनों से मीडिया सेना प्रमुख के एक बयान पर कोहराम मचाये हुए है। संक्षेप में बयान यह था कि जो भी सेना की कारवाई में व्यवधान उत्पन्न करने की कोशिश करेगा या सेना पर पथराव करेगा अथवा राष्ट्रद्रोही किसी भी गतिविधि में भाग लेगा जैसे पाकिस्तान या आईएसआई का झण्डा लहरायेगा,  सेना उस पर कड़ी कारवाई करेगी।

अब इस बयान में सेना प्रमुख ने न तो कश्मीरियों के बारे में कुछ कहा न ही कश्मीरी युवाओं के बारे में एक शब्द बोला फिर भी एक तथाकथित पत्रकार हरिन्दर बाजवा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा  “General Rawat, hold your fire. All Kashmiri youth are not aides of Jihadis” अब इसका मतलब तो साफ है कि वो कश्मीरियों को और अस्थिर करना चाहती है.. अपने ही देश, अपनी ही सेना के खिलाफ जहर भर रही हैं। कैसी पत्रकारिता है यह?

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